प्रश्न 1 - मन्त्र 7

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते ।
तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥

sa eṣa vaiśvānaro viśvarūpaḥ prāṇo’gnirudayate .
tadetadṛcābhyuktam .. 7 ..


वह यह (भोक्ता) वैश्वानर विश्वरूप प्राण अग्नि ही प्रकट होता है । यही बात ऋक् ने भी कही है ॥ ७ ॥
वह यह भोक्ता प्राण वैश्वानर (समष्टि जीवरूप), सर्वात्मा और सर्वरूप है तथा सर्वमय होने के कारण ही प्राण और अग्निरूप है । वह भोक्ता ही प्रतिदिन सम्पूर्ण दिशाओं को आत्मभूत करता हुआ उदित होता अर्थात् ऊपर की ओर जाता है । यह ऊपर कही बात ही ऋक् अर्थात् मन्त्र द्वारा भी कही गयी है ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स एषोऽत्ता प्राणो वैश्वानरः सर्वात्मा विश्वरूपो विश्वात्मत्वाच्च प्राणोऽग्निश्च स एवात्तोदयत उद्गच्छति प्रत्यहं सर्वा दिश आत्मसात्कुर्वन् । तदेतदुक्तं वस्तु ऋचा मन्त्रेणाप्यभ्युक्तम् ॥ ७ ॥