एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥
ta eva punarāvartante tasmādeta ṛṣayaḥ prajākāmā dakṣiṇaṃ pratipadyante .
eṣa ha vai rayiryaḥ pitṛyāṇaḥ .. 9 ..
वह मिथुन ही संवत्सररूप काल है और वही प्रजापति है, क्योंकि संवत्सर उस मिथुन से ही निष्पन्न हुआ है । चन्द्रमा और सूर्य से निष्पन्न होनेवाली तिथि और दिन-रात्रि के समुदाय का नाम ही संवत्सर है; अतः वह (संवत्सर) रयि और प्राण से अभिन्न होने के कारण मिथुनरूप ही कहा जाता है । सो किस प्रकार? उस संवत्सर नामक प्रजापति के दक्षिण और उत्तर दो अयन—मार्ग हैं । ये छः-छः मासवाले दो अयन प्रसिद्ध ही हैं, जिनसे कि सूर्य केवल कर्मपरायण और ज्ञानसंयुक्त कर्मपरायण पुरुषों के पुण्यलोकों का विधान करता हुआ दक्षिण तथा उत्तर मार्गों से गमन करता है ।
सो किस प्रकार? इसपर कहते हैं—उन ब्राह्मणादि में जो ऋषिलोग निश्चयपूर्वक उस इष्ट और पूर्त यानी इष्टापूर्त इत्यादि कृत की ही उपासना करते हैं—अकृत की नहीं करते वे सर्वदा चान्द्रमस—चन्द्रमा में ही होनेवाले यानी मिथुनात्मक प्रजापति के अंश रयि अर्थात् अन्नभूत लोक को ही जीतते हैं, क्योंकि चन्द्रलोक कृत (कर्म) रूप है । श्रुति में दूसरा ‘तत्’ शब्द क्रियाविशेषण है । वे वहाँ ही अपने कर्म का क्षय होने पर फिर लौट आते हैं, जैसा कि “इस (मनुष्य) लोक अथवा इससे भी निकृष्ट (तिर्यगादि) लोक में प्रवेश करते हैं” इस [मुण्डक श्रुति]-में कहा है ।
क्योंकि ऐसा है इसलिये ये सन्तानार्थी ऋषि—स्वर्गद्रष्टा गृहस्थलोग इष्ट और पूर्त कर्मों द्वारा उनके फलरूप से अन्नात्मक प्रजापति यानी चन्द्रलोक का ही निर्माण करते हैं; अतः वे अपने कर्मों द्वारा उपार्जित दक्षिण यानी दक्षिणायनमार्ग से उपलक्षित चन्द्रलोक को ही प्राप्त होते हैं । यह जो पितृयाण अर्थात् पितृयाण से उपलक्षित चन्द्रलोक है वह निश्चय रयि—अन्न ही है ॥ ९ ॥
तात्पर्य पढ़ें
तदेव कालः संवत्सरो वै प्रजापतिस्तन्निर्वर्त्यत्वात्संवत्सरस्य । चन्द्रादित्यनिर्वर्त्यतिथ्यहोरात्रसमुदायो हि संवत्सरः तदनन्यत्वाद्रयिप्राणमिथुनात्मक एवेत्युच्यते । तत्कथम्? तस्य संवत्सरस्य प्रजापतेरयने मार्गों द्वौ दक्षिणं चोत्तरं च द्वे प्रसिद्धे ह्ययने षण्मासलक्षणे याभ्यां दक्षिणेनोत्तरेण च याति सविता केवलकर्मिणां ज्ञानसंयुक्तकर्मवतां च लोकान् विदधत् ।
कथम्? तत् तत्र च ब्राह्मणादिषु ये ह वै तदुपासत इति, क्रियाविशेषणो द्वितीयस्तच्छब्दः, इष्टं च पूर्तं चेष्टापूर्ते इत्यादि कृतमेवोपासते नाकृतं नित्यं ते चान्द्रमसं चन्द्रमसि भवं प्रजापतेर्मिथुनात्मकस्यांशं रयिमन्नभूतं लोकमभिजयन्ते कृतरूपत्वाच्चान्द्रमसस्य । ते तत्रैव च कृतक्षयात्पुनरावर्तन्ते “इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति” (मु० उ० १ । २ । १०) इति ह्युक्तम् ।
यस्मादेवं प्रजापतिमन्नात्मकं फलत्वेनाभिनिर्वर्तयन्ति चन्द्रम् इष्टापूर्तकर्मणैत ऋषयः स्वर्गद्रष्टारः प्रजाकामाः प्रजार्थिनो गृहस्थास्तस्मात्स्वकृतमेव दक्षिणं दक्षिणायनोपलक्षितं चन्द्रं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिरन्नं यः पितृयाणः पितृयाणोपलक्षितः चन्द्रः ॥ ९ ॥