अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ ।
भगवन्कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
भगवन्कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
atha hainaṃ bhārgavo vaidarbhiḥ papraccha .
bhagavankatyeva devāḥ prajā vidhārayante katara etatprakāśayante kaḥ punareṣāṃ variṣṭha iti .. 1 ..
तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनि से विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा—‘भगवन्! इस प्रजा को कितने देवता धारण करते हैं? उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं? और कौन उनमें सर्वश्रेष्ठ है? ’ ॥ १ ॥
तदनन्तर उनसे विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा—‘हे भगवन्! इस शरीररूप प्रजा को कितने देवता विधारण करते यानी विशेषरूप से धारण करते हैं तथा ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों में विभक्त हुए उन देवताओं में से कौन इसे प्रकाशित करते हैं—अपने माहात्म्य को प्रकट करना ही प्रकाशन है—और इन भूत एवं इन्द्रिय देवताओं में से कौन सर्वश्रेष्ठ यानी प्रधान है? ’ ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथानन्तरं ह किलैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । हे भगवन् कत्येव देवाः प्रजां शरीरलक्षणां विधारयन्ते विशेषेण धारयन्ते । कतरे बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियविभक्तानामेतत्प्रकाशनं स्वमाहात्म्यप्रख्यापनं प्रकाशयन्ते । कोऽसौ पुनरेषां वरिष्ठः प्रधानः कार्यकारणलक्षणानामिति ॥ १ ॥