प्रश्न 2 - मन्त्र 10

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥

yadā tvamabhivarṣasyathemāḥ prāṇa te prajāḥ .
ānandarūpāstiṣṭhanti kāmāyānnaṃ bhaviṣyatīti .. 10 ..


हे प्राण! जिस समय तू मेघरूप होकर बरसता है उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा यह समझकर कि ‘अब यथेच्छ अन्न होगा’ आनन्दरूप से स्थित होती है ॥ १० ॥

जिस समय तू मेघ होकर बरसता है उस समय यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न पाकर प्राणन यानी प्राणक्रिया करती है—यह इसका भावार्थ है । अथवा [यों समझो कि] हे प्राण! ‘ते’—तेरा स्वात्मभूत यह प्रजावर्ग तेरे [दिये हुए] अन्न से वृद्धि को प्राप्त होकर तेरी वृष्टि के दर्शनमात्र से आनन्दरूप अर्थात् सुख को प्राप्त हुए के समान स्थित है । उसके आनन्दरूप होने में यह अभिप्राय है कि [उस वृष्टि से उसे ऐसी आशा हो जाती है कि] ‘अब यथेच्छ अन्न उत्पन्न होगा’ ॥ १० ॥

> [ * ]: प्राणों के अभाव में शरीर को सूखते देखा गया है; अतः उन्हें अंग का रस कहते हैं ।

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यदा पर्जन्यो भूत्वाभिवर्षसि त्वमथ तदान्नं प्राप्येमाः प्रजाः प्राणते प्राणचेष्टां कुर्वन्तीत्यर्थः । अथवा प्राण ते तवेमाः प्रजाः स्वात्मभूतास्त्वदन्नसंवर्धितास्त्वदभिवर्षणदर्शनमात्रेण चानन्दरूपाः सुखं प्राप्ता इव सत्यस्तिष्ठन्ति कामायेच्छातोऽन्नं भविष्यतीत्येवमभिप्रायः ॥ १० ॥

इसके सिवा—
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किं च—