वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११ ॥
vrātyastvaṃ prāṇaikarṣirattā viśvasya satpatiḥ .
vayamādyasya dātāraḥ pitā tvaṃ mātariśva naḥ .. 11 ..
हे प्राण! सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होने से किसी अन्य संस्कारकर्ता का अभाव होने के कारण तू व्रात्य (संस्कारहीन) है, तात्पर्य यह है कि तू स्वभाव से ही शुद्ध है । तू आथर्वणों का एकर्षि यानी एकर्षि नामक प्रसिद्ध अग्नि होकर सम्पूर्ण हवियों का भोक्ता है तथा तू ही समस्त विद्यमान जगत् का पति है इसलिये, अथवा [सबका] साधु पति होने के कारण तू सत्पति है ।
हम तो तेरे आद्य—भक्ष्य हवि के देनेवाले हैं । हे मातरिश्वन्! तू हमारा पिता है । अथवा [यों समझो कि] तू ‘मातरिश्वनः’—वायु का पिता है । अतः तुझमें सम्पूर्ण जगत् का पितृत्व सिद्ध होता है ॥ ११ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्रथमजत्वादन्यस्य संस्कर्तुः अभावादसंस्कृतो व्रात्यस्त्वं स्वभावत एव शुद्ध इत्यभिप्रायः । हे प्राणैकर्षिस्त्वमाथर्वणानां प्रसिद्ध एकर्षिनामाग्निः सन्नत्ता सर्वहविषाम् । त्वमेव विश्वस्य सर्वस्य सतो विद्यमानस्य पतिः सत्पतिः । साधुर्वा पतिः सत्पतिः ।
वयं पुनराद्यस्य तवादनीयस्य हविषो दातारः । त्वं पिता मातरिश्व हे मातरिश्वन्नोऽस्माकम् । अथ वा मातरिश्वनो वायोस्त्वम् । अतश्च सर्वस्यैव जगतः पितृत्वं सिद्धम् ॥ ११ ॥