या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥
yā te tanūrvāci pratiṣṭhitā yā śrotre yā ca cakṣuṣi .
yā ca manasi santatā śivāṃ tāṃ kuru motkramīḥ .. 12 ..
तेरा जो स्वरूप वाणी में स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और मन में व्याप्त है उसे तू शान्त कर । तू उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥
तेरा जो स्वरूप वक्तारूप से बोलने की चेष्टा करता हुआ वाणी में स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और संकल्पादि व्यापार से मन में व्याप्त है उसे शिव— शान्त कर । उत्क्रमण न कर, अर्थात् उत्क्रमण करके उसे अशिव—अमंगलमय न कर ॥ १२ ॥
बहुत क्या—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
या ते त्वदीया तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता वक्तृत्वेन वदनचेष्टां कुर्वती, या श्रोत्रे या च चक्षुषि या च मनसि सङ्कल्पादिव्यापारेण सन्तता समनुगता तनूस्तां शिवां शान्तां कुरु मोत्क्रमीरुत्क्रमणेन अशिवां मा कार्षीरित्यर्थः ॥ १२ ॥
किं बहुना—