प्रश्न 2 - मन्त्र 13

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये द्वितीयः प्रश्नः ॥ २ ॥

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥

prāṇasyedaṃ vaśe sarvaṃ tridive yatpratiṣṭhitam .
māteva putrān rakṣasva śrīśca prajñāṃ ca vidhehi na iti .. 13 ..


यह सब तथा स्वर्गलोक में जो कुछ स्थित है वह प्राण के ही अधीन है । जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा हमें श्री और बुद्धि प्रदान कर ॥ १३ ॥

इस लोक में यह जो कुछ उपभोग की सामग्री है वह सब प्राण के ही अधीन है तथा त्रिदिव अर्थात् तीसरे द्युलोक (स्वर्ग)-में भी देवता आदि का उपभोगरूप जो कुछ वैभव है उसका भी ईश्वर—रक्षक प्राण ही है । अतः माता जिस प्रकार पुत्रों की रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारा पालन कर । ब्राह्मण और क्षत्रियों की श्री—विभूतियाँ भी तेरे ही निमित्त से हैं । वह श्री तथा अपनी स्थिति के निमित्त से ही होनेवाली प्रज्ञा तू हमें प्रदान कर—ऐसा इसका भावार्थ है ।

इस प्रकार वागादि प्राणों के स्तुति करने से जिसकी महिमा सर्वात्मरूप से बतलायी गयी है वह प्राण ही प्रजापति और भोक्ता है—यह निश्चय हुआ ॥ १३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अस्मिँल्लोके प्राणस्यैव वशे सर्वमिदं यत्किञ्चिदुपभोगजातं त्रिदिवे तृतीयस्यां दिवि च यत्प्रतिष्ठितं देवाद्युपभोगजातं तस्यापि प्राण एवेशिता रक्षिता । अतो मातेव पुत्रानस्मान् रक्षस्व पालयस्व । त्वन्निमित्ता हि ब्राह्म्यः क्षात्रियाश्च श्रियस्तास्त्वं श्रीश्च श्रियश्च प्रज्ञां च त्वत्स्थितिनिमित्तां विधेहि नो विधत्स्व इत्यर्थः ।

इत्येवं सर्वात्मतया वागादिभिः प्राणैः स्तुत्या गमितमहिमा प्राणः प्रजापतिरत्तेत्यवधृतम् ॥ १३ ॥


तृतीय प्रश्न