इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये द्वितीयः प्रश्नः ॥ २ ॥
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥
prāṇasyedaṃ vaśe sarvaṃ tridive yatpratiṣṭhitam .
māteva putrān rakṣasva śrīśca prajñāṃ ca vidhehi na iti .. 13 ..
इस लोक में यह जो कुछ उपभोग की सामग्री है वह सब प्राण के ही अधीन है तथा त्रिदिव अर्थात् तीसरे द्युलोक (स्वर्ग)-में भी देवता आदि का उपभोगरूप जो कुछ वैभव है उसका भी ईश्वर—रक्षक प्राण ही है । अतः माता जिस प्रकार पुत्रों की रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारा पालन कर । ब्राह्मण और क्षत्रियों की श्री—विभूतियाँ भी तेरे ही निमित्त से हैं । वह श्री तथा अपनी स्थिति के निमित्त से ही होनेवाली प्रज्ञा तू हमें प्रदान कर—ऐसा इसका भावार्थ है ।
इस प्रकार वागादि प्राणों के स्तुति करने से जिसकी महिमा सर्वात्मरूप से बतलायी गयी है वह प्राण ही प्रजापति और भोक्ता है—यह निश्चय हुआ ॥ १३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अस्मिँल्लोके प्राणस्यैव वशे सर्वमिदं यत्किञ्चिदुपभोगजातं त्रिदिवे तृतीयस्यां दिवि च यत्प्रतिष्ठितं देवाद्युपभोगजातं तस्यापि प्राण एवेशिता रक्षिता । अतो मातेव पुत्रानस्मान् रक्षस्व पालयस्व । त्वन्निमित्ता हि ब्राह्म्यः क्षात्रियाश्च श्रियस्तास्त्वं श्रीश्च श्रियश्च प्रज्ञां च त्वत्स्थितिनिमित्तां विधेहि नो विधत्स्व इत्यर्थः ।
इत्येवं सर्वात्मतया वागादिभिः प्राणैः स्तुत्या गमितमहिमा प्राणः प्रजापतिरत्तेत्यवधृतम् ॥ १३ ॥