ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
tasmai sa hovācākāśo ha vā eṣa devo vāyuragnirāpaḥ pṛthivī vāṅmanaścakṣuḥ śrotraṃ ca .
te prakāśyābhivadanti vayametadbāṇamavaṣṭabhya vidhārayāmaḥ .. 2 ..
इस प्रकार पूछते हुए उस भार्गव से पिप्पलाद ने कहा—निश्चय आकाश ही वह देव है तथा [उसके सहित] वायु, अग्नि, जल और पृथिवी—ये शरीर को आरम्भ करनेवाले पाँच भूत एवं वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियाँ—ये कार्य (पंचभूत) और करण (इन्द्रिय)-रूप देव अपनी महिमा को प्रकट करते हुए अपनी-अपनी श्रेष्ठता के लिये परस्पर स्पर्द्धापूर्वक कहते हैं ।
किस प्रकार कहते हैं? [सो बतलाते हैं—] इस कार्यकरण के संघातरूप शरीर को, जिस प्रकार महल को स्तम्भ धारण करते हैं, उसी प्रकार आश्रय देकर उसे शिथिल न होने देकर हम स्पष्टरूप से धारण करते हैं । उनमें से प्रत्येक का यही अभिप्राय रहता है कि इस संघात को अकेले मैंने ही धारण किया है ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एवं पृष्टवते तस्मै स होवाच आकाशो ह वा एष देवो वायुः अग्निः आपः पृथिवीत्येतानि पञ्च महाभूतानि शरीरारम्भकाणि वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रमित्यादीनि कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियाणि च । कार्यलक्षणाः करणलक्षणाश्च ते देवा आत्मनो माहात्म्यं प्रकाश्याभिवदन्ति स्पर्धमाना अहं श्रेष्ठतायै ।
कथं वदन्ति? वयमेतद्बाणं कार्यकरणसंघातमवष्टभ्य प्रासादम् इव स्तम्भादयोऽविशिथिलीकृत्य विधारयामो विस्पष्टं धारयामः । मयैवैकेनायं संघातो ध्रियत इत्येकैकस्याभिप्रायः ॥ २ ॥