प्रश्न 2 - मन्त्र 2

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ।
ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

tasmai sa hovācākāśo ha vā eṣa devo vāyuragnirāpaḥ pṛthivī vāṅmanaścakṣuḥ śrotraṃ ca .
te prakāśyābhivadanti vayametadbāṇamavaṣṭabhya vidhārayāmaḥ .. 2 ..


तब उससे आचार्य पिप्पलाद ने कहा—वह देव आकाश है । वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, वाक् (सम्पूर्ण कर्मेन्द्रियाँ), मन (अन्तःकरण) और चक्षु (ज्ञानेन्द्रियसमूह) [ये भी देव ही हैं] । वे सभी अपनी महिमा को प्रकट करते हुए कहते हैं—‘हम ही इस शरीर को आश्रय देकर धारण करते हैं’ ॥ २ ॥

इस प्रकार पूछते हुए उस भार्गव से पिप्पलाद ने कहा—निश्चय आकाश ही वह देव है तथा [उसके सहित] वायु, अग्नि, जल और पृथिवी—ये शरीर को आरम्भ करनेवाले पाँच भूत एवं वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियाँ—ये कार्य (पंचभूत) और करण (इन्द्रिय)-रूप देव अपनी महिमा को प्रकट करते हुए अपनी-अपनी श्रेष्ठता के लिये परस्पर स्पर्द्धापूर्वक कहते हैं ।

किस प्रकार कहते हैं? [सो बतलाते हैं—] इस कार्यकरण के संघातरूप शरीर को, जिस प्रकार महल को स्तम्भ धारण करते हैं, उसी प्रकार आश्रय देकर उसे शिथिल न होने देकर हम स्पष्टरूप से धारण करते हैं । उनमें से प्रत्येक का यही अभिप्राय रहता है कि इस संघात को अकेले मैंने ही धारण किया है ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

एवं पृष्टवते तस्मै स होवाच आकाशो ह वा एष देवो वायुः अग्निः आपः पृथिवीत्येतानि पञ्च महाभूतानि शरीरारम्भकाणि वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रमित्यादीनि कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियाणि च । कार्यलक्षणाः करणलक्षणाश्च ते देवा आत्मनो माहात्म्यं प्रकाश्याभिवदन्ति स्पर्धमाना अहं श्रेष्ठतायै ।

कथं वदन्ति? वयमेतद्बाणं कार्यकरणसंघातमवष्टभ्य प्रासादम् इव स्तम्भादयोऽविशिथिलीकृत्य विधारयामो विस्पष्टं धारयामः । मयैवैकेनायं संघातो ध्रियत इत्येकैकस्याभिप्रायः ॥ २ ॥