तान्वरिष्ठः प्राण उवाच ।
मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥
मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥
tānvariṣṭhaḥ prāṇa uvāca .
mā mohamāpadyathāhamevaitatpañcadhātmānaṃ pravibhajyaitadbāṇamavaṣṭabhya vidhārayāmīti te’śraddadhānā babhūvuḥ .. 3 ..
[एक बार] उनसे सर्वश्रेष्ठ प्राण ने कहा—‘तुम मोह को प्राप्त मत होओ; मैं ही अपने को पाँच प्रकार से विभक्त कर इस शरीर को आश्रय देकर धारण करता हूँ ।’ किन्तु उन्होंने उसका विश्वास न किया ॥ ३ ॥
इस प्रकार अभिमानयुक्त हुए उन देवों से वरिष्ठ—मुख्य प्राण ने कहा—‘इस प्रकार मोह को प्राप्त मत होओ अर्थात् अविवेक के कारण अभिमान मत करो, क्योंकि अपने को पाँच भागों में विभक्त कर—अपने प्राणादि पाँच वृत्तिभेद कर मैं ही इस शरीर को आश्रय देकर धारण करता हूँ ।’ उसके ऐसा कहने पर वे उसके कथन में अश्रद्धालु—अविश्वासी ही रहे कि ऐसा कैसे हो सकता है? ॥ ३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तानेवमभिमानवतो वरिष्ठो मुख्यः प्राण उवाचोक्तवान् । मा मैवं मोहमापद्यथ अविवेकितया अभिमानं मा कुरुत यस्मादहमेव एतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामि पञ्चधात्मानं प्रविभज्य प्राणादिवृत्तिभेदं स्वस्य कृत्वा विधारयामीत्युक्तवति च तस्मिंस्तेऽश्रद्दधाना अप्रत्ययवन्तो बभूवुः कथमेतदेवमिति ॥ ३ ॥