प्रश्न 2 - मन्त्र 4

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते ।
तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

so’bhimānādūrdhvamutkramata iva tasminnutkrāmatyathetare sarva evotkrāmante tasmiṃśca pratiṣṭhamāne sarva eva prātiṣṭhante .
tadyathā makṣikā madhukararājānamutkrāmantaṃ sarvā evotkrāmante tasmiṃśca pratiṣṭhamāne sarvā eva prātiṣṭhanta evaṃ vāṅmanaścakṣuḥśrotraṃ ca te prītāḥ prāṇaṃ stunvanti .. 4 ..


तब वह अभिमानपूर्वक मानो ऊपर को उठने लगा । उसके ऊपर उठने के साथ और सब भी उठने लगे तथा उसके स्थित होने पर सब स्थित हो जाते । जिस प्रकार मधुकरराज के ऊपर उठने पर सभी मक्खियाँ ऊपर चढ़ने लगती हैं और उसके बैठ जाने पर सभी बैठ जाती हैं उसी प्रकार वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि भी [प्राण के साथ उठने और प्रतिष्ठित होने लगे] । तब वे सन्तुष्ट होकर प्राण की स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥
तब वह प्राण उनकी अश्रद्धालुता को देखकर क्रोधवश निरपेक्ष हो अभिमानपूर्वक मानो ऊपर को उठने लगा । उसके ऊपर उठने पर जो कुछ हुआ उसे दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं— उसके ऊपर उठने के अनन्तर ही चक्षु आदि अन्य सभी प्राण (इन्द्रियाँ) उत्क्रमण करने यानी उठने लगे । तथा उस प्राण के ही स्थित होने—चुप होने यानी उत्क्रमण न करने पर वे सभी स्थित हो जाते—चुपचाप बैठ जाते थे । जैसे कि इस लोक में मधुमक्खियाँ अपने सरदार मधुकरराज के उठने के साथ ही सब-की-सब उठ जाती हैं और उसके बैठने पर सब-की-सब बैठ जाती हैं । जैसा यह दृष्टान्त है । वैसे ही वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि भी हो गये । तब वे वागादि अपने अविश्वास को छोड़कर और प्राण की महिमा को जानकर सन्तुष्ट हो प्राण की स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥
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स च प्राणस्तेषामश्रद्दधानतामालक्ष्याभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इवोदक्रान्तवानिव सरोषान्निरपेक्षस्तस्मिन्नुत्क्रामति यद्वृत्तं तद्दृष्टान्तेन प्रत्यक्षीकरोति । तस्मिन्नुत्क्रामति सत्यथानन्तरम् एवेतरे सर्व एव प्राणाश्चक्षुरादय उत्क्रामन्त उच्चक्रमिरे । तस्मिंश्च प्राणे प्रतिष्ठमाने तूष्णीं भवति अनुत्क्रामति सति सर्व एव प्रातिष्ठन्ते तूष्णीं व्यवस्थिता अभूवन् । तत्तत्र यथा लोके मक्षिका मधुकराः स्वराजानं मधुकरराजानम् उत्क्रामन्तं प्रति सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्ते प्रतितिष्ठन्ति । यथाय दृष्टान्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं चेत्यादयस्त उत्सृज्याश्रद्दधानतां बुद्ध्वा प्राणमाहात्म्यं प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति स्तुवन्ति ॥ ४ ॥

किस प्रकार [स्तुति करने लगे, सो बतलाते हैं—]
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कथम्—