प्रश्न 2 - मन्त्र 5

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः ।
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥

eṣo’gnistapatyeṣa sūrya eṣa parjanyo maghavāneṣa vāyuḥ .
eṣa pṛthivī rayirdevaḥ sadasaccāmṛtaṃ ca yat .. 5 ..


यह प्राण अग्नि होकर तपता है, यह सूर्य है, यह मेघ है, यही इन्द्र और वायु है तथा यह देव ही पृथिवी, रयि और जो कुछ सत्, असत् एवं अमृत है, वह सब कुछ है ॥ ५ ॥
यह प्राण अग्नि होकर तपता— प्रज्वलित होता है । तथा यह सूर्य होकर प्रकाशित होता है और मेघ होकर बरसता है । यही मघवा—इन्द्र होकर प्रजा का पालन करता तथा असुर और राक्षसों का वध करना चाहता है । यही आवह-प्रवह आदि भेदोंवाला वायु है । अधिक क्या यह देव ही पृथिवी और रयि (चन्द्रमा)-रूप से सम्पूर्ण जगत् का धारक और पोषक है । सत्—स्थूल, असत्—सूक्ष्म और देवताओं की स्थिति का कारणरूप अमृत भी यही है ॥ ५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एष प्राणोऽग्निः संस्तपति ज्वलति । तथैष सूर्यः सन् प्रकाशते, तथैष पर्जन्यः सन् वर्षति । किं च मघवानिन्द्रः सन् प्रजाः पालयति, जिघांसत्यसुररक्षांसि । एष वायुरावहप्रवहादिभेदः । किं चैष पृथिवी रयिर्देवः सर्वस्य जगतः सन्मूर्तमसदमूर्तं चामृतं च यद्देवानां स्थितिकारणं किं बहुना ॥ ५ ॥