प्रश्न 2 - मन्त्र 6

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
ऋचो यजूग्ँषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

arā iva rathanābhau prāṇe sarvaṃ pratiṣṭhitam .
ṛco yajūg̐ṣi sāmāni yajñaḥ kṣatraṃ brahma ca .. 6 ..


जैसे रथ की नाभि में अरे लगे रहते हैं उसी तरह ऋक्, यजुः, साम, यज्ञ तथा क्षत्रिय और ब्राह्मण—ये सब प्राण में ही स्थित हैं ॥ ६ ॥
जिस प्रकार रथ की नाभि में अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जगत् के स्थितिकाल में [प्रश्न० ६ ।४ में बतलाये जानेवाले] श्रद्धा से लेकर नामपर्यन्त सम्पूर्ण पदार्थ प्राण में ही स्थित हैं । तथा ऋक्, यजुः और साम—तीन प्रकार के मन्त्र, उनसे निष्पन्न होनेवाला यज्ञ, सबका पालन करनेवाले क्षत्रिय और यज्ञादि कर्मों के अधिकारी ब्राह्मण—ये सब भी प्राण ही हैं ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अरा इव रथनाभौ श्रद्धादिनामान्तं सर्वं स्थितिकाले प्राण एव प्रतिष्ठितम् । तथर्चो यजूंषि सामानीति त्रिविधा मन्त्राः तत्साध्यश्च यज्ञः क्षत्रं च सर्वस्य पालयितृ ब्रह्म च यज्ञादिकर्मकर्तृत्वेऽधिकृतं चैवैष प्राणः सर्वम् ॥ ६ ॥

तथा
संस्कृत भाष्य पढ़ें
किं च—