प्रश्न 2 - मन्त्र 7

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे ।
तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

prajāpatiścarasi garbhe tvameva pratijāyase .
tubhyaṃ prāṇa prajāstvimā baliṃ haranti yaḥ prāṇaiḥ pratitiṣṭhasi .. 7 ..


हे प्राण! तू ही प्रजापति है, तू ही गर्भ में संचार करता है, और तू ही जन्म ग्रहण करता है । यह [मनुष्यादि] सम्पूर्ण प्रजा तुझे ही बलि समर्पण करती है, क्योंकि तू समस्त इन्द्रियों के साथ स्थित रहता है ॥ ७ ॥

जो प्रजापति है वह भी तू ही है; तू ही गर्भ में संचार करता है और मातापिता के अनुरूप होकर तू ही जन्म लेता है । प्रजापति होने के कारण तेरा मातापितारूप होना तो पहले से ही सिद्ध है । तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण देह और देही के मिष से एक तू प्राण ही सर्वात्मा है ।

ये जो मनुष्यादि प्रजाएँ हैं, हे प्राण! वे चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा तुझे ही बलि समर्पण करती हैं, जो तू कि चक्षु आदि इन्द्रियों के साथ समस्त शरीरों में स्थित है; अतः वे तुझे ही बलि समर्पण करती हैं, उनका ऐसा करना उचित ही है, क्योंकि भोक्ता तू ही है, और अन्य सब तेरा ही भोज्य है ॥ ७ ॥

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यः प्रजापतिरपि स त्वमेव गर्भे चरसि, पितुर्मातुश्च प्रतिरूपः सन्नप्रतिजायसे; प्रजापतित्वादेव प्रागेव सिद्धं तव मातृपितृत्वम् । सर्वदेहदेह्याकृतिच्छद्मनैकः प्राणः सर्वात्मासीत्यर्थः ।

तुभ्यं त्वदर्थं या इमा मनुष्याद्याः प्रजास्तु हे प्राण चक्षुरादिद्वारैर्बलिं हरन्ति । यस्त्वं प्राणैश्चक्षुरादिभिः सह प्रतितिष्ठसि सर्वशरीरेष्वतस्तुभ्यं बलिं हरन्तीति युक्तम्; भोक्ता हि यतस्त्वं तवैवान्यत्सर्वं भोज्यम् ॥ ७ ॥


तथा—
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किं च—