देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥
devānāmasi vahnitamaḥ pitṝṇāṃ prathamā svadhā .
ṛṣīṇāṃ caritaṃ satyamatharvāṅgirasāmasi .. 8 ..
तू देवताओं के लिये वह्नितम है, पितृगण के लिये प्रथम स्वधा है और अथर्वांगिरस ऋषियों [यानी चक्षु आदि प्राणों]-के लिये सत्य आचरण है ॥ ८ ॥
तू इन्द्रादि देवताओं के लिये वह्नितम—हवियों को पहुँचानेवालों में श्रेष्ठ है, पितृगण की प्रथम स्वधा है— नान्दीमुख श्राद्ध में पितरों को जो अन्नमयी स्वधा दी जाती है वह देवप्रधान कर्म की अपेक्षा से प्रथम है, उस प्रथम स्वधा को भी पितरों को प्राप्त करानेवाला तू ही है—ऐसा इसका भावार्थ है । तथा ऋषियों यानी चक्षु आदि प्राणों का, जो कि “प्राणो वाथर्वा” इस श्रुति के अनुसार अंगिरस्—अंग के रसस्वरूप[ * ] अथर्वा हैं, उनका सत्य—अवितथ अर्थात् देहधारणादि में उपकारी चरित—आचरण भी तू ही है ॥ ८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
देवानामिन्द्रादीनामसि भवसि त्वं वह्नितमो हविषां प्रापयितृतमः । पितॄणां नान्दीमुखे श्राद्धे या पितृभ्यो दीयते स्वधान्नं सा देवप्रधानमपेक्ष्य प्रथमा भवति । तस्या अपि पितृभ्यः प्रापयिता त्वमेवेत्यर्थः । किं चर्षीणां चक्षुरादीनां प्राणा नामङ्गिरसामङ्गिरसभूतानामथर्वणां तेषामेव “प्राणो वाथर्वा” इति श्रुतेः, चरितं चेष्टितं सत्यमवितथं देहधारणाद्युपकारलक्षणं त्वमेवासि ॥ ८ ॥