भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥
atha hainaṃ kausalyaścāśvalāyanaḥ papraccha .
bhagavankuta eṣa prāṇo jāyate kathamāyātyasmiñśarīra ātmānaṃ vā pravibhajya kathaṃ prātiṣṭhate kenotkramate kathaṃ bāhyamabhidhatte kathamadhyātmamiti .. 1 ..
तदनन्तर, उन (पिप्पलाद मुनि)-से अश्वल के पुत्र कौसल्य ने पूछा—‘पूर्वोक्त प्रकार से चक्षु आदि प्राणों (इन्द्रियों)-के द्वारा जिसका तत्त्व निश्चय हो गया है तथा जिसकी महिमा का भी अनुभव हो गया है वह प्राण संहत (सावयव) होने के कारण कार्यरूप होना चाहिये । इसलिये हे भगवन्! मैं पूछता हूँ कि जिस प्रकार का पहले निश्चय किया गया है वैसा यह प्राण किससे—किस कारणविशेष से उत्पन्न होता है?
तथा उत्पन्न होनेपर किस वृत्तिविशेष से इस शरीर में आता है? अर्थात् इसका शरीरग्रहण किस कारण से होता है? और शरीर में प्रविष्ट होकर अपने को विभक्त कर—अपने अनेकों विभाग कर किस प्रकार उसमें स्थित होता है? फिर किस वृत्तिविशेष से इस शरीर से उत्क्रमण करता है? और किस प्रकार बाह्य यानी अधिभूत और अधिदैव विषयों को धारण करता है? तथा किस प्रकार अध्यात्म (देहेन्द्रियादि)-को [धारण करता है? ] ‘धारण करता है’ यह वाक्य शेष है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । प्राणो ह्येवं प्राणैर्निर्धारिततत्त्वैरुपलब्धमहिमापि संहतत्वात्स्यादस्य कार्यत्वमतः पृच्छामि भगवन्कुतः कस्मात्कारणादेष यथावधृतः प्राणो जायते ।
जातश्च कथं केन वृत्तिविशेषेण आयात्यस्मिञ्शरीरे । किं निमित्तकमस्य शरीरग्रहणमित्यर्थः । प्रविष्टश्च शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य प्रविभागं कृत्वा कथं केन प्रकारेण प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति केन वा वृत्तिविशेषेणास्माच्छरीरादुत्क्रमत उत्क्रामति । कथं बाह्यमधिभूतमधिदैवतं चाभिधत्ते धारयति कथमध्यात्मम् इति, धारयतीति शेषः ॥ १ ॥