प्रश्न 3 - मन्त्र 10

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥

yaccittastenaiṣa prāṇamāyāti prāṇastejasā yuktaḥ sahātmanā yathāsaṃkalpitaṃ lokaṃ nayati .. 10 ..


इसका जैसा चित्त [संकल्प] होता है उसके सहित यह प्राण को प्राप्त होता है । तथा प्राण तेज से (उदानवृत्ति से) संयुक्त हो [उस भोक्ता को] आत्मा के सहित संकल्प किये हुए लोक को ले जाता है ॥ १० ॥

इसका जैसा चित्त होता है उस चित्त—संकल्प के सहित ही यह जीव इन्द्रियों के सहित प्राण अर्थात् मुख्य प्राणवृत्ति को प्राप्त होता है । तात्पर्य यह कि मरणकाल में यह प्रक्षीण इन्द्रियवृत्तिवाला होकर मुख्य प्राणवृत्ति से ही स्थित होता है । उसी समय जातिवाले कहा करते हैं कि ‘अभी श्वास लेता है—अभी जीवित है’ इत्यादि ।

वह प्राण ही तेज अर्थात् उदानवृत्ति से सम्पन्न हो आत्मा—भोक्ता स्वामी के साथ [सम्मिलित होता है] । तथा उदानवृत्ति से संयुक्त हुआ वह प्राण ही उस भोक्ता जीव को उसके पाप-पुण्यमय कर्मों के अनुसार यथासंकल्पित अर्थात् उसके अभिप्रायानुसारी लोकों को ले जाता—प्राप्त करा देता है ॥ १० ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यच्चित्तो भवति तेनैव चित्तेन संकल्पेनेन्द्रियैः सह प्राणं मुख्यप्राणवृत्तिमायाति । मरणकाले क्षीणेन्द्रियवृत्तिः सन्मुख्यया प्राणवृत्त्यैवावतिष्ठत इत्यर्थः । तदाभिवदन्ति ज्ञातय उच्छ्वसिति जीवतीति ।

स च प्राणस्तेजसोदानवृत्त्या युक्तः सन्सहात्मना स्वामिना भोक्त्रा स एवमुदानवृत्त्यैव युक्तः प्राणस्तं भोक्तारं पुण्यपापकर्मवशाद्यथासङ्कल्पितं यथाभिप्रेतं लोकं नयति प्रापयति ॥ १० ॥