yaccittastenaiṣa prāṇamāyāti prāṇastejasā yuktaḥ sahātmanā yathāsaṃkalpitaṃ lokaṃ nayati .. 10 ..
इसका जैसा चित्त होता है उस चित्त—संकल्प के सहित ही यह जीव इन्द्रियों के सहित प्राण अर्थात् मुख्य प्राणवृत्ति को प्राप्त होता है । तात्पर्य यह कि मरणकाल में यह प्रक्षीण इन्द्रियवृत्तिवाला होकर मुख्य प्राणवृत्ति से ही स्थित होता है । उसी समय जातिवाले कहा करते हैं कि ‘अभी श्वास लेता है—अभी जीवित है’ इत्यादि ।
वह प्राण ही तेज अर्थात् उदानवृत्ति से सम्पन्न हो आत्मा—भोक्ता स्वामी के साथ [सम्मिलित होता है] । तथा उदानवृत्ति से संयुक्त हुआ वह प्राण ही उस भोक्ता जीव को उसके पाप-पुण्यमय कर्मों के अनुसार यथासंकल्पित अर्थात् उसके अभिप्रायानुसारी लोकों को ले जाता—प्राप्त करा देता है ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यच्चित्तो भवति तेनैव चित्तेन संकल्पेनेन्द्रियैः सह प्राणं मुख्यप्राणवृत्तिमायाति । मरणकाले क्षीणेन्द्रियवृत्तिः सन्मुख्यया प्राणवृत्त्यैवावतिष्ठत इत्यर्थः । तदाभिवदन्ति ज्ञातय उच्छ्वसिति जीवतीति ।
स च प्राणस्तेजसोदानवृत्त्या युक्तः सन्सहात्मना स्वामिना भोक्त्रा स एवमुदानवृत्त्यैव युक्तः प्राणस्तं भोक्तारं पुण्यपापकर्मवशाद्यथासङ्कल्पितं यथाभिप्रेतं लोकं नयति प्रापयति ॥ १० ॥