प्रश्न 3 - मन्त्र 11

य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥

ya evaṃ vidvānprāṇaṃ veda na hāsya prajā hīyate’mṛto bhavati tadeṣa ślokaḥ .. 11 ..


जो विद्वान् प्राण को इस प्रकार जानता है उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती । वह अमर हो जाता है । इस विषय में यह श्लोक है ॥ ११ ॥
जो कोई विद्वान् पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त विशेषणों से विशिष्ट प्राण को उसके उत्पत्ति आदि के सहित जानता है उसके लिये यह लौकिक और पारलौकिक फल बतलाया जाता है— इस विद्वान् की पुत्र-पौत्रादिरूप प्रजा हीन—उच्छिन्न अर्थात् नष्ट नहीं होती तथा शरीर के पतित होने पर प्राणसायुज्य को प्राप्त हो जाने के कारण वह अमृत—अमरणधर्मा हो जाता है । इस विषय में संक्षेप से बतलानेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है— ॥ ११ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यः कश्चिदेवं विद्वान्यथोक्तविशेषणैर्विशिष्टमुत्पत्त्यादिभिः प्राणं वेद जानाति तस्येदं फलम् ऐहिकमामुष्मिकं चोच्यते । न हास्य नैवास्य विदुषः प्रजा पुत्रपौत्रादिलक्षणा हीयते छिद्यते । पतिते च शरीरे प्राणसायुज्यतयामृतोऽमरणधर्मा भवति तदेतस्मिन्नर्थे संक्षेपाभिधायक एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ ११ ॥