तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
tasmai sa hovācātipraśnānpṛcchasi brahmiṣṭho’sīti tasmātte’haṃ bravīmi .. 2 ..
उससे पिप्पलाद आचार्य ने कहा—‘तू बड़े कठिन प्रश्न पूछता है । परन्तु तू [बड़ा] ब्रह्मवेत्ता है; अतः मैं तेरे प्रश्नों का उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥
उससे उस आचार्य ने कहा—‘प्रथम तो प्राण ही दुर्विज्ञेय होने के कारण विषम प्रश्न का विषय है; तिसपर भी तू तो उसके भी जन्मादि पूछता है । अतः तू बड़े ही कड़े प्रश्न पूछ रहा है ।
परन्तु तू ब्रह्मिष्ठ—अत्यन्त ब्रह्मवेत्ता है, अतः मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, सो तूने जो कुछ पूछा है वह तुझसे कहता हूँ, सुन ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तस्मै स होवाचाचार्यः, प्राण एव तावद्दुर्विज्ञेयत्वाद्विषमप्रश्नार्हस्तस्यापि जन्मादि त्वं पृच्छस्यतोऽतिप्रश्नान्पृच्छसि ।
ब्रह्मिष्ठोऽसीत्यतिशयेन त्वं ब्रह्मविदतस्तुष्टोऽहं तस्मात्ते तुभ्यं ब्रवीमि यत्पृष्टं शृणु ॥ २ ॥