आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥
ātmana eṣa prāṇo jāyate yathaiṣā puruṣe chāyaitasminnetadātataṃ manokṛtenāyātyasmiñśarīre .. 3 ..
यह प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है । जिस प्रकार मनुष्य-शरीर से यह छाया उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस आत्मा में प्राण व्याप्त है तथा यह मनोकृत संकल्पादि से इस शरीर में आ जाता है ॥ ३ ॥
यह उपर्युक्त प्राण आत्मा—परम पुरुष—अक्षर यानी सत्य से उत्पन्न होता है । किस प्रकार उत्पन्न होता है? इसमें यह दृष्टान्त देते हैं—जिस प्रकार लोक में सिर तथा हाथ-पाँववाले पुरुषरूप निमित्त के रहते हुए ही उससे होनेवाली छाया उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस ब्रह्म यानी सत्य पुरुष में यह छायास्थानीय मिथ्या तत्त्व व्याप्त—समर्पित है । देह में छाया के समान यह मन के कार्य से यानी मन के संकल्प और इच्छादि से होनेवाले कर्म से इस शरीर में आता है; जैसा कि आगे “पुण्य से पुण्यलोक को ले जाता है” आदि श्रुति से कहेंगे और यही बात “कर्मफल में आसक्त हुआ पुरुष अपने कर्म के सहित [उसीको प्राप्त होता है]” इस अन्य श्रुति से भी कही गयी है ॥ ३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
आत्मनः परमात्पुरुषादक्षरात्सत्यादेष उक्तः प्राणो जायते । कथमित्यत्र दृष्टान्तः । यथा लोक एषा पुरुषे शिरःपाण्यादिलक्षणे निमित्ते छाया नैमित्तिकी जायते तद्वदेतस्मिन्ब्रह्मण्येतत् प्राणाख्यं छायास्थानीयमनृतरूपं तत्त्वं सत्ये पुरुष आततं समर्पितम् इत्येतत् । छायेव देहे मनोकृतेन मनःसङ्कल्पेच्छादिनिष्पन्नकर्मनिमित्तेनेत्येतत्—वक्ष्यति हि “पुण्येन पुण्यम्” (प्र० उ० ३ ।७) इत्यादि; तदेव “सक्तः सह कर्मणा” (बृ० उ० ४ । ४ । ६) इति च श्रुत्यन्तरात्—आयाति आगच्छत्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥