प्रश्न 3 - मन्त्र 4

यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते ।
एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥

yathā samrāḍevādhikṛtānviniyuṅkte .
etāngrāmānetāngrāmānadhitiṣṭhasvetyevamevaiṣa prāṇa itarānprāṇānpṛthakpṛthageva saṃnidhatte .. 4 ..


जिस प्रकार सम्राट् ही ‘तुम इन-इन ग्रामों में रहो’ इस प्रकार अधिकारियों को नियुक्त करता है उसी प्रकार यह मुख्य प्राण ही अन्य प्राणों (इन्द्रियों)-को अलग-अलग नियुक्त करता है ॥ ४ ॥
जिस प्रकार लोक में राजा ही ग्रामादि में अधिकारियों को नियुक्त करता है; किस प्रकार [नियुक्त करता है? कि] तुम इन-इन ग्रामों में अधिष्ठान (निवास) करो । इस प्रकार, जैसा यह दृष्टान्त है वैसे ही, यह मुख्य प्राण भी अपने भेदस्वरूप चक्षु आदि अन्य प्राणों को अलग-अलग उनके स्थानों के अनुसार स्थापित करता यानी नियुक्त करता है ॥ ४ ॥
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यथा येन प्रकारेण लोके राजा सम्राडेव ग्रामादिष्वधिकृतान्विनियुङ्क्ते । कथम्? एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्व इति । एवमेव यथा दृष्टान्तः, एष मुख्यः प्राण इतरान्प्राणान् चक्षुरादीनात्मभेदांश्च पृथक् पृथगेव यथास्थानं संनिधत्ते विनियुङ्क्ते ॥ ४ ॥

पञ्च प्राणों की स्थिति

उनका विभाग इस प्रकार है—
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तत्र विभागः—