प्रश्न 3 - मन्त्र 5

पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः ।
एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५ ॥

pāyūpasthe’pānaṃ cakṣuḥśrotre mukhanāsikābhyāṃ prāṇaḥ svayaṃ prātiṣṭhate madhye tu samānaḥ .
eṣa hyetaddhutamannaṃ samaṃ nayati tasmādetāḥ saptārciṣo bhavanti .. 5 ..


वह [प्राण] पायु और उपस्थ में अपान को [नियुक्त करता है] और मुख तथा नासिका से निकलता हुआ नेत्र एवं श्रोत्र में स्वयं स्थित होता है तथा मध्य में समान रहता है । यह [समानवायु] ही खाये हुए अन्न को समभाव से [शरीर में सर्वत्र] ले जाता है । उस [प्राणाग्नि]-से ही [दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासारन्ध्र और एक रसना] ये सात ज्वालाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥

यह प्राण अपने भेद अपान को पायूपस्थ में—पायु (गुदा) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय)-में मूत्र और पुरीष (मल) आदि को निकालते हुए स्थित करता यानी नियुक्त करता है । तथा मुख और नासिका इन दोनों से निकलता हुआ सम्राट्स्थानीय प्राण चक्षुःश्रोत्रे—चक्षु और श्रोत्र में स्थित रहता है । तथा प्राण और अपान के स्थानों के मध्य नाभिदेश में समान रहता है, जो खाये और पीये हुए पदार्थ को सम करने के कारण समान कहलाता है ।

क्योंकि यह समानवायु ही खायीपीयी वस्तु को अर्थात् देहान्तर्वर्ती जठरानल में डाले हुए अन्न को समभाव से [समस्त शरीर में] पहुँचाता है इसलिये खान-पानरूप ईंधन से हृदयदेश में प्राप्त हुए इस जठराग्नि से ये शिरोदेशवर्तिनी सात अर्चियाँ—दीप्तियाँ निकलती हैं ।

तात्पर्य यह है कि रूपादि विषयों के दर्शन-श्रवण आदिरूप प्रकाश प्राण से ही निष्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥

तात्पर्य पढ़ें

पायूपस्थे पायुश्चोपस्थश्च पायूपस्थं तस्मिन्, अपानमात्मभेदं मूत्रपुरीषाद्यपनयनं कुर्वंस्तिष्ठति संनिधत्ते । तथा चक्षुःश्रोत्रे चक्षुश्च श्रोत्रं च चक्षुःश्रोत्रं तस्मिंश्चक्षुःश्रोत्रे, मुखनासिकाभ्यां च मुखं च नासिका च ताभ्यां मुखनासिकाभ्यां च निर्गच्छन्प्राणः स्वयं सम्राट्स्थानीयः प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति मध्ये तु प्राणापानयोः स्थानयोर्नाभ्यां समानोऽशितं पीतं च समं नयतीति समानः ।

एष हि यस्माद्यदेतद्धुतं भुक्तं पीतं चात्माग्नौ प्रक्षिप्तमन्नं समं नयति तस्मादशितपीतेन्धनाद् अग्नेरौदर्याद्धृदयदेशं प्राप्तादेताः सप्तसंख्याका अर्चिषो दीप्तयो निर्गच्छन्त्यो भवन्ति शीर्षण्याः ।

प्राणद्वारा दर्शनश्रवणादिलक्षणरूपादिविषयप्रकाशा इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥