अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥ ६ ॥
hṛdi hyeṣa ātmā .
atraitadekaśataṃ nāḍīnāṃ tāsāṃ śataṃ śatamekaikasyāṃ dvāsaptatirdvāsaptatiḥ pratiśākhānāḍīsahasrāṇi bhavantyāsu vyānaścarati .. 6 ..
यह आत्मा—आत्मासहित लिंगदेह अर्थात् जीवात्मा हृदय में यानी कमल के-से आकारवाले मांसपिण्ड से परिच्छिन्न हृदयाकाश में रहता है । इस हृदयदेश में ये एक शत यानी एक ऊपर सौ (एक सौ एक) प्रधान नाडियाँ हैं । उनमें से प्रत्येक प्रधान नाडी के सौ-सौ भेद हैं और प्रधान नाडी के उन सौ-सौ भेदों में से प्रत्येक में बहत्तर-बहत्तर सहस्र अर्थात् दो ऊपर सत्तर सहस्र प्रतिशाखा नाडियाँ हैं । [इस प्रकार] प्रधान नाडियों में से प्रत्येक सौ-सौ नाडियों में हजारों नाडियाँ हैं ।
इन सब नाडियों में व्यानवायु संचार करता है । व्यापक होने के कारण उसे ‘व्यान’ कहते हैं । जिस प्रकार सूर्य से किरणें निकलती हैं उसी प्रकार हृदय से निकलकर सब ओर फैली हुई नाडियों द्वारा व्यान सम्पूर्ण देह को व्याप्त करके स्थित है । सन्धिस्थान, स्कन्धदेश और मर्मस्थलों में तथा विशेषतया प्राण और अपानवायु की वृत्तियों के मध्य में इस (व्यानवायु)-की अभिव्यक्ति होती है और यही पराक्रमयुक्त कर्मों का करनेवाला है ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
हृदि ह्येष पुण्डरीकाकारमांसपिण्डपरिच्छिन्ने हृदयाकाश एष आत्मात्मना संयुक्तो लिङ्गात्मा । अत्रास्मिन्हृदय एतदेकशतम् एकोत्तरशतं संख्यया प्रधाननाडीनां भवतीति । तासां शतं शतमेकैकस्याः प्रधाननाड्या भेदाः । पुनरपि द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिर्द्वे द्वे सहस्रे अधिके सप्ततिश्च सहस्राणि सहस्राणां द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि प्रतिप्रतिनाडीशतं संख्यया प्रधाननाडीनां सहस्राणि भवन्ति ।
आसु नाडीषु व्यानो वायुश्चरति व्यानो व्यापनात् । आदित्यादिव रश्मयो हृदयात् सर्वतोगामिनीभिर्नाडीभिः सर्वदेहं संव्याप्य व्यानो वर्तते । सन्धिस्कन्धमर्मदेशेषु विशेषेण प्राणापानवृत्त्योश्च मध्य उद्भूतवृत्तिर्वीर्यवत्कर्मकर्ता भवति ॥ ६ ॥