प्रश्न 3 - मन्त्र 7

अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥

athaikayordhva udānaḥ puṇyena puṇyaṃ lokaṃ nayati pāpena pāpamubhābhyāmeva manuṣyalokam .. 7 ..


तथा [इन सब नाडियों में से सुषुम्ना नाम की] एक नाडी द्वारा ऊपर की ओर गमन करनेवाला उदानवायु [जीव को] पुण्य-कर्म के द्वारा पुण्यलोक को और पापकर्म के द्वारा पापमय लोक को ले जाता है तथा पुण्य-पाप दोनों प्रकार के (मिश्रित) कर्मों द्वारा उसे मनुष्यलोक को प्राप्त कराता है ॥ ७ ॥
तथा उन एक सौ एक नाडियों में से जो सुषुम्नानाम्नी एक ऊर्ध्वगामिनी नाडी है उस एक के द्वारा ही ऊपर की ओर जानेवाला तथा चरण से मस्तकपर्यन्त संचार करनेवाला उदानवायु [जीवात्मा को] पुण्य कर्म यानी शास्त्रोक्त कर्म से देवादि-स्थानरूप पुण्यलोक को प्राप्त करा देता है तथा उससे विपरीत पापकर्म द्वारा पापलोक यानी तिर्यग्योनि आदि नरक को ले जाता है और समानरूप से प्रधान हुए पुण्य-पापरूप दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा वह उसे मनुष्यलोक को प्राप्त कराता है । यहाँ ‘नयति’ इस क्रिया की सर्वत्र अनुवृत्ति होती है ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथ या तु तत्रैकशतानां नाडीनां मध्य ऊर्ध्वगा सुषुम्नाख्या नाडी तयैकयोर्ध्वः सन्नुदानो वायुरापादतलमस्तकवृत्तिः सञ्चरन्पुण्येन कर्मणा शास्त्रविहितेन पुण्यं लोकं देवादिस्थानलक्षणं नयति प्रापयति पापेन तद्विपरीतेन पापं नरकं तिर्यग्योन्यादिलक्षणम् । उभाभ्यां समप्रधानाभ्यां पुण्यपापाभ्यामेव मनुष्यलोकं नयतीत्यनुवर्तते ॥ ७ ॥