तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥
tejo ha vā udānastasmādupaśāntatejāḥ punarbhavamindriyairmanasi sampadyamānaiḥ .. 9 ..
लोकप्रसिद्ध [आदित्यरूप] तेज ही उदान है । अतः जिसका तेज (शारीरिक ऊष्मा) शान्त हो जाता है वह मन में लीन हुई इन्द्रियों के सहित पुनर्जन्म को [अथवा पुनर्जन्म के हेतुभूत मृत्यु को] प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
जो [आदित्यसंज्ञक] प्रसिद्ध बाह्य सामान्य तेज है वही शरीर में उदान है; तात्पर्य यह है कि वही अपने प्रकाश से उदान वायु को अनुगृहीत करता है । क्योंकि उत्क्रमण करनेवाला [उदानवायु] तेजःस्वरूप है—बाह्य तेज से अनुगृहीत होनेवाला है इसलिये जिस समय लौकिक पुरुष उपशान्ततेजा होता है अर्थात् जिसका स्वाभाविक तेज शान्त हो गया है ऐसा होता है उस समय उसे क्षीणायु—मरणासन्न समझना चाहिये । वह पुनर्भव यानी देहान्तर को प्राप्त होता है । किस प्रकार प्राप्त होता है? [इसपर कहते हैं—] मन में लीन—प्रविष्ट होती हुई वागादि इन्द्रियों के सहित [वह देहान्तर को प्राप्त होता है] ॥ ९ ॥
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यद्बाह्यं ह वै प्रसिद्धं सामान्यं तेजस्तच्छरीर उदान उदानं वायुमनुगृह्णाति स्वेन प्रकाशेनेत्यभिप्रायः । यस्मात्तेजःस्वभावो बाह्यतेजोऽनुगृहीत उत्क्रान्तिकर्ता तस्माद्यदा लौकिकः पुरुष उपशान्ततेजा भवति; उपशान्तं स्वाभाविकं तेजो यस्य सः, तदा तं क्षीणायुषं मुमूर्षु विद्यात् । स पुनर्भवं शरीरान्तरं प्रतिपद्यते । कथम्? सहेन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः प्रविशद्भिर्वागादिभिः ॥ ९ ॥
मरणकालिक संकल्प का फल
मरणकाल में—
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मरणकाले—