प्रश्न 4 - मन्त्र 1

अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ ।
भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥

atha hainaṃ sauryāyaṇī gārgyaḥ papraccha .
bhagavannetasminpuruṣe kāni svapanti kānyasmiñjāgrati katara eṣa devaḥ svapnānpaśyati kasyaitatsukhaṃ bhavati kasminnu sarve saṃpratiṣṭhitā bhavantīti .. 1 ..


तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनि से सूर्य के पौत्र गार्ग्य ने पूछा—‘भगवन्! इस पुरुष में कौन [इन्द्रियाँ] सोती हैं? कौन इसमें जागती हैं? कौन देव स्वप्नों को देखता है? किसे यह सुख अनुभव होता है? तथा किसमें ये सब प्रतिष्ठित हैं? ’ ॥ १ ॥

तदनन्तर उनसे सौर्यायणी गार्ग्य ने पूछा । उपर्युक्त तीन प्रश्नों में अपरा विद्या के विषय व्याकृताश्रित साध्यसाधनरूप अनित्य संसार का निरूपण समाप्त कर अब साध्य-साधन से अतीत तथा प्राण, मन और इन्द्रियों के अविषय, परविद्यावेद्य, शिव, शान्त, अविकारी, अक्षर, सत्य और बाहरभीतर विद्यमान अजन्मा पुरुष नामक तत्त्व का वर्णन करना है; इसीलिये आगे के तीन प्रश्नों का आरम्भ किया जाता है ।

तहाँ, द्वितीय मुण्डक में यह बात कही गयी है कि ‘अच्छी तरह प्रज्वलित हुए अग्नि से स्फुलिंगों (चिनगारियों) के समान जिसपर अक्षर से सम्पूर्ण भाव पदार्थ उत्पन्न होते और उसीमें लीन हो जाते हैं’ इत्यादि; सो उस अक्षर परमात्मा से अभिव्यक्त होनेवाले वे सम्पूर्ण भाव कौन-से हैं? उससे विभक्त होकर वे किस प्रकार उसीमें लीन होते हैं? तथा वह अक्षर किन लक्षणोंवाला है? यह सब बतलाने के लिये अब श्रुति आगे के प्रश्न उठाती है—

भगवन्! सिर और हाथपैरोंवाले इस पुरुष में कौन इन्द्रियाँ सोती—निद्रा लेती अर्थात् अपने व्यापार से उपरत होती हैं? तथा कौन इसमें जागती यानी जागरण—अनिद्रावस्था अर्थात् अपना व्यापार करती हैं? कार्यकरणरूप [यानी देहेन्द्रियरूप] देवों में से कौन देव स्वप्नों को देखता है? जाग्रद्दर्शन से निवृत्त हुए जीव का जो अन्तःकरण में जाग्रत् के समान विषयों को देखना है उसे स्वप्न कहते हैं । सो यह कार्य कोई कार्यरूप देव निष्पन्न करता है, अथवा करणरूप देव? यह इसका अभिप्राय है ।

तथा जाग्रत् और स्वप्न का व्यापार समाप्त हो जाने पर जो प्रसन्न, अनायासरूप एवं निर्बाध सुख होता है वह भी किसे होता है? उस समय जाग्रत् और स्वप्न के व्यापार से उपरत होकर सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भली प्रकार एकीभूत होकर किसमें स्थित होती हैं? अर्थात् मधु में रसों के समान तथा समुद्र में प्रविष्ट हुई नदी आदि के समान विवेचन के (पृथक्-प्रतीति के) अयोग्य होकर वे किसमें भली प्रकार प्रतिष्ठित अर्थात् सम्मिलित हो जाती हैं?

शंका—[काम करने के अनन्तर] छोड़े हुए दराँती आदि करणों (औजारों) के समान इन्द्रियाँ भी अपने-अपने व्यापार से निवृत्त होकर अलग-अलग अपने में ही स्थित हो जाती हैं—ऐसा समझना ठीक ही है । फिर प्रश्नकर्ता को सोये हुए पुरुषों की इन्द्रियों के किसीमें एकीभाव हो जाने की आशंका कैसे प्राप्त हो सकती है?

समाधान—यह आशंका तो उचित ही है, क्योंकि भूतों के संघात से उत्पन्न हुई इन्द्रियाँ अपने स्वामी के लिये प्रवृत्त होनेवाली होने से जाग्रत्काल में भी परतन्त्र ही हैं; अतः सुषुप्ति में भी उन संहत इन्द्रियों का परतन्त्ररूप से ही किसीमें मिलना उचित है । इसलिये यह प्रश्न आशंका के अनुरूप ही है । यहाँ पूछनेवाले का यह प्रश्न कि ‘वह कौन है? ’ ‘वे सब किसमें प्रतिष्ठित होती हैं? ’ सुषुप्ति और प्रलयकाल में जिसमें यह कार्य-करण का संघात लीन होता है उसकी विशेषता जानने के लिये है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । प्रश्नत्रयेणापरविद्यागोचरं सर्वं परिसमाप्य संसारं व्याकृतविषयं साध्यसाधनलक्षणमनित्यम्; अथेदानीमसाध्यसाधनलक्षणमप्राणममनोगोचरमतीन्द्रियविषयं शिवं शान्तमविकृतमक्षरं सत्यं परविद्यागम्यं पुरुषाख्यं सबाह्याभ्यन्तरमजं वक्तव्यमित्युत्तरं प्रश्नत्रयमारभ्यते ।

तत्र सुदीप्तादिवाग्नेर्यस्मात् परादक्षरात्सर्वे भावा विस्फुलिङ्गा इव जायन्ते तत्र चैवापियन्ति इत्युक्तं द्वितीये मुण्डके; के ते सर्वे भावा अक्षराद्विभज्यन्ते? कथं वा विभक्ताः सन्तस्तत्रैव अपियन्ति? किं लक्षणं वा तदक्षरमिति? एतद्विवक्षयाधुना प्रश्नान् उद्भावयति—

भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे शिरःपाण्यादिमति कानि करणानि स्वपन्ति स्वापं कुर्वन्ति स्वव्यापारादुपरमन्ते कानि चास्मिन् जाग्रति जागरणमनिद्रावस्थां स्वव्यापारं कुर्वन्ति । कतरः कार्यकरणलक्षणयोरेष देवः स्वप्नान्पश्यति? स्वप्नो नाम जाग्रद्दर्शनान्निवृत्तस्य जाग्रद्वदन्तःशरीरे यद्दर्शनम् । तत्किं कार्यलक्षणेन देवेन निर्वर्त्यते किं वा करणलक्षणेन केनचिदित्यभिप्रायः ।

उपरते च जाग्रत्स्वप्नव्यापारे यत्प्रसन्नं निरायासलक्षणमनाबाधं सुखं कस्यैतद्भवति । तस्मिन्काले जाग्रत्स्वप्नव्यापाराद् उपरताः सन्तः कस्मिन्नु सर्वे सम्यगेकीभूताः संप्रतिष्ठिताः । मधुनि रसवत्समुद्रप्रविष्टनद्यादिवच्च विवेकानर्हाः प्रतिष्ठिता भवन्ति संगताः संप्रतिष्ठिता भवन्तीत्यर्थः ।

ननु न्यस्तदात्रादिकरणवत् स्वव्यापारादुपरतानि पृथक्पृथगेव स्वात्मन्यवतिष्ठन्त इत्येतद्युक्तं कुतः प्राप्तिः सुषुप्तपुरुषाणां करणानां कस्मिंश्चिदेकीभावगमनाशङ्कायाः प्रष्टुः ।

युक्तैव त्वाशङ्का । यतः संहतानि करणानि स्वाम्यर्थानि परतन्त्राणि च जाग्रद्विषये तस्मात् स्वापेऽपि संहतानां पारतन्त्र्येणैव कस्मिंश्चित्संगतिर्न्याय्येति तस्माद् आशङ्कानुरूप एव प्रश्नोऽयम् । अत्र तु कार्यकरणसंघातो यस्मिंश्च प्रलीनः सुषुप्तप्रलयकालयोस्तद्विशेषं बुभुत्सोः स को नु स्यादिति कस्मिन्सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥