परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य ।
स सर्वज्ञः सर्वो भवति ।
तदेष श्लोकः ॥ १० ॥
स सर्वज्ञः सर्वो भवति ।
तदेष श्लोकः ॥ १० ॥
paramevākṣaraṃ pratipadyate sa yo ha vai tadacchāyamaśarīramalohitaṃ śubhramakṣaraṃ vedayate yastu somya .
sa sarvajñaḥ sarvo bhavati .
tadeṣa ślokaḥ .. 10 ..
हे सोम्य! इस छायाहीन, अशरीरी, अलोहित, शुभ्र अक्षर को जो पुरुष जानता है वह पर अक्षर को ही प्राप्त हो जाता है । वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है । इस सम्बन्ध में यह श्लोक (मन्त्र) है ॥ १० ॥
उसके विषय में ऐसा कहते हैं कि वह आगे बतलाये जानेवाले विशेषणों से युक्त पर अक्षर को ही प्राप्त हो जाता है । सम्पूर्ण एषणाओं से छूटा हुआ जो अधिकारी उस अच्छाय—तमोहीन, अशरीर—नामरूपमय सम्पूर्ण औपाधिक शरीरों से रहित, अलोहित—लोहितादि सब प्रकार के गुणों से हीन, और ऐसा होने के कारण ही जो शुभ्र—शुद्ध, सम्पूर्ण विशेषणों से रहित होने के कारण अक्षर, पुरुषसंज्ञक सत्य, अप्राण, मन का अविषय, शिव, शान्त और सबाह्याभ्यन्तर अज परब्रह्म को जानता है, तथा जो सबका त्याग करनेवाला है, हे सोम्य! वह सर्वज्ञ हो जाता है—उससे कुछ भी अज्ञात नहीं रह सकता । वह अविद्यावश पहले असर्वज्ञ था, फिर विद्या द्वारा अविद्या के नष्ट हो जाने पर वही सर्वरूप हो जाता है । इस विषय में उपर्युक्त अर्थ का संग्रह करनेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
परमेवाक्षरं वक्ष्यमाणविशेषणं प्रतिपद्यत इत्येतदुच्यते । स यो ह वै तत्सर्वैषणाविनिर्मुक्तोऽच्छायं तमोवर्जितम्, अशरीरं नामरूपसर्वोपाधिशरीरवर्जितम्, अलोहितं लोहितादिसर्वगुणवर्जितम्, यत एवमतः शुभ्रं शुद्धम्, सर्वविशेषणरहितत्वादक्षरम्, सत्यं पुरुषाख्यम्, अप्राणम् अमनोगोचरम्, शिवं शान्तं सबाह्याभ्यन्तरमजं वेदयते विजानाति यस्तु सर्वत्यागी सोम्य स सर्वज्ञो न तेनाविदितं किञ्चित् सम्भवति । पूर्वमविद्ययासर्वज्ञ आसीत्पुनर्विद्ययाविद्यापनये सर्वो भवति तदा । तत्तस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति उक्तार्थसंग्राहकः ॥ १० ॥