प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति ।
गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
prāṇāgnaya evaitasminpure jāgrati .
gārhapatyo ha vā eṣo’pāno vyāno’nvāhāryapacano yadgārhapatyātpraṇīyate praṇayanādāhavanīyaḥ prāṇaḥ .. 3 ..
[सुषुप्तिकाल में] इस शरीररूप पुर में प्राणाग्नि ही जागते हैं । यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन है तथा जो गार्हपत्य से ले जाया जाता है वह प्राण ही प्रणयन (ले जाये जाने) के कारण आहवनीय अग्नि है ॥ ३ ॥
इस पुर यानी नौ द्वारवाले देह में श्रोत्रादि इन्द्रियों के सो जाने पर प्राणाग्नि—प्राणादि पाँच वायु ही अग्नि के समान अग्नि हैं, वे ही जागते हैं । अब अग्नि के साथ उनकी समानता बतलाते हैं—यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है । किस प्रकार है, सो बतलाते हैं—क्योंकि अग्निहोत्र के समय गार्हपत्य अग्नि से ही आहवनीय नामक दूसरा अग्नि [जिसमें कि हवन किया जाता है] सम्पन्न किया जाता है; अतः प्रणयन किये जाने के कारण ‘प्रणीयतेऽस्मात्’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार वह गार्हपत्याग्नि ‘प्रणयन’ है । इसी प्रकार प्राण भी सोये हुए पुरुष की अपानवृत्ति से प्रणीत हुआ-सा ही मुख और नासिकाद्वारा संचार करता है; अतः वह आहवनीय-स्थानीय है । तथा व्यान हृदय के दक्षिण छिद्रद्वारा निकलने के कारण दक्षिण दिशा के सम्बन्ध से अन्वाहार्यपचन यानी दक्षिणाग्नि है ॥ ३ ॥
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सुप्तवत्सु श्रोत्रादिषु करणेषु एतस्मिन्पुरे नवद्वारे देहे प्राणाग्नयः प्राणा एव पञ्च वायवोऽग्नय इवाग्नयो जाग्रति । अग्निसामान्यं हि आह—गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानः । कथमित्याह—यस्माद्गार्हपत्यादग्नेरग्निहोत्रकाल इतरोऽग्निः आहवनीयः प्रणीयते प्रणयनात् प्रणीयतेऽस्मादिति प्रणयनो गार्हपत्योऽग्निः । तथा सुप्तस्यापानवृत्तेः प्रणीयत इव प्राणो मुखनासिकाभ्यां संचरत्यत आहवनीयस्थानीयः प्राणः । व्यानस्तु हृदयाद् दक्षिणसुषिरद्वारेण निर्गमाद्दक्षिणदिक्सम्बन्धादन्वाहार्यपचनो दक्षिणाग्निः ॥ ३ ॥
प्राणाग्नि के ऋत्विक्
यहाँ [अगले वाक्य से] अग्निहोत्र के होता (ऋत्विक्) का वर्णन किया जाता है—
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अत्र च होताग्निहोत्रस्य—