प्रश्न 4 - मन्त्र 4

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः ।
मनो ह वाव यजमानः ।
इष्टफलमेवोदानः ।
स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥

yaducchvāsaniḥśvāsāvetāvāhutī samaṃ nayatīti sa samānaḥ .
mano ha vāva yajamānaḥ .
iṣṭaphalamevodānaḥ .
sa enaṃ yajamānamaharaharbrahma gamayati .. 4 ..


क्योंकि उच्छ्वास और निःश्वास ये मानो अग्निहोत्र की आहुतियाँ हैं, उन्हें जो [शरीर की स्थिति के लिये] समभाव से विभक्त करता है वह समान [ऋत्विक् है]; मन ही निश्चय यजमान है, और इष्टफल ही उदान है; वह उदान इस मनरूप यजमान को नित्यप्रति ब्रह्म के पास पहुँचा देता है ॥ ४ ॥

क्योंकि उच्छ्वास और निःश्वास अग्निहोत्र की आहुतियों के समान हैं, अतः [इनमें और अग्निहोत्र की आहुतियों में] समानरूप से द्वित्व होने के कारण जो वायु शरीर की स्थिति के लिये इन दोनों आहुतियों को साम्यभाव से सर्वदा चलाता है वह [पूर्वमन्त्र के अनुसार] अग्निस्थानीय होने पर भी आहुतियों का नेता होने के कारण होता ही है । वह है कौन? समान । अतः विद्वान् की निद्रा भी अग्निहोत्र का हवन ही है । इसलिये अभिप्राय यह है कि विद्वान् को अकर्मा नहीं मानना चाहिये । इसीसे बृहदारण्यकोपनिषद् में भी कहा है कि उस विद्वान् के सोने पर भी सब भूत सर्वदा चयन (यागानुष्ठान) किया करते हैं ।

इस अवस्था में बाह्य इन्द्रियों और विषयों को पंच प्राणरूप जागते हुए (प्रज्वलित) अग्नि में हवन कर मनरूप यजमान अग्निहोत्र के फल स्वर्ग के समान ब्रह्म के प्रति जाने की इच्छा से जागता रहता है । यजमान के समान भूत और इन्द्रियों में प्रधानता से व्यवहार करने और स्वर्ग के समान ब्रह्म के प्रति प्रस्थित होने से मन यजमानरूप से कल्पना किया गया है ।

उदानवायु ही इष्टफल यानी यज्ञ का फल है, क्योंकि इष्टफल की प्राप्ति उदानवायु के निमित्त से ही होती है । किस प्रकार? [सो बतलाते हैं—] वह उदानवायु इस मन नामवाले यजमान को स्वप्नवृत्ति से भी गिराकर नित्यप्रति सुषुप्तिकाल में स्वर्ग के समान अक्षरब्रह्म को प्राप्त करा देता है । अतः उदान यागफलस्थानीय है ॥ ४ ॥

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यद्यस्मादुच्छ्वासनिःश्वासौ अग्निहोत्राहुती इव नित्यं द्वित्वसामान्यादेव त्वेतावाहुती समं साम्येन शरीरस्थितिभावाय नयति यो वायुरग्निस्थानीयोऽपि होता चाहुत्योर्नेतृत्वात् । कोऽसौ स समानः । अतश्च विदुषः स्वापोऽप्यग्निहोत्रहवनमेव । तस्माद्विद्वान्नाकर्मीत्येवं मन्तव्य इत्यभिप्रायः ।

सर्वदा सर्वाणि भूतानि विचिन्वन्त्यपि स्वपत इति हि वाजसनेयके ।

अत्र हि जाग्रत्सु प्राणाग्निषु उपसंहृत्य बाह्यकरणानि विषयांश्च अग्निहोत्रफलमिव स्वर्गं ब्रह्म जिगमिषुर्मनो ह वाव यजमानो जागर्ति यजमानवत्कार्यकरणेषु प्राधान्येन संव्यवहारात्स्वर्गमिव ब्रह्म प्रति प्रस्थितत्वाद्यजमानो मनः कल्प्यते ।

इष्टफलं यागफलमेवोदानो वायुः । उदाननिमित्तत्वादिष्टफलप्राप्तेः । कथम्? स उदानो मनआख्यं यजमानं स्वप्नवृत्तिरूपादपि प्रच्याव्याहरहः सुषुप्तिकाले स्वर्गमिव ब्रह्माक्षरं गमयति । अतो यागफलस्थानीय उदानः ॥ ४ ॥


इस प्रकार विद्वान् को श्रोत्रादि इन्द्रियों के उपरत होने के समय से लेकर जबतक वह सोने से उठता है तबतक सम्पूर्ण यज्ञों का फल ही अनुभव होता है, अज्ञानियों के समान [उसकी निद्रा] अनर्थ की हेतु नहीं होती—ऐसा कहकर विद्वत्ता की ही स्तुति की गयी है, क्योंकि केवल विद्वान् की ही श्रोत्रादि इन्द्रियाँ सोती और प्राणाग्नियाँ जागती हैं तथा उसीका मन जाग्रत् और सुषुप्ति में स्वतन्त्रता का अनुभव करता हुआ रोज-रोज सुषुप्ति को प्राप्त होता है—ऐसी बात नहीं है । क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में जाना तो सभी प्राणियों के लिये समान है । अतः यह विद्वत्ता की स्तुति ही हो सकती है । अब, पहले जो यह पूछा था कि कौन देव स्वप्नों को देखता है? सो बतलाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
एवं विदुषः श्रोत्राद्युपरमकालादारभ्य यावत्सुप्तोत्थितो भवति तावत्सर्वयागफलानुभव एव नाविदुषामिवानर्थायेति विद्वत्ता स्तूयते । न हि विदुष एव श्रोत्रादीनि स्वपन्ते प्राणाग्नयो वा जाग्रति जाग्रत्स्वप्नयोर्मनः । स्वातन्त्र्यमनुभवदहरहः सुषुप्तं वा प्रतिपद्यते । समानं हि सर्वप्राणिनां पर्यायेण जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिगमनमतो विद्वत्तास्तुतिरेव इयमुपपद्यते । यत्पृष्टं कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यतीति तदाह—