प्रश्न 4 - मन्त्र 6

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

sa yadā tejasābhibhūto bhavatyatraiṣa devaḥ svapnānna paśyatyatha tadaitasmiñśarīra etatsukhaṃ bhavati .. 6 ..


जिस समय यह मन तेज से आक्रान्त होता है उस समय यह आत्मदेव स्वप्न नहीं देखता । उस समय इस शरीर में यह सुख होता है ॥ ६ ॥
जिस समय वह मनरूप देव नाडी में रहनेवाले पित्त नामक सौर तेज से सब ओर से अभिभूत अर्थात् जिसकी वासनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार लुप्त हो गया है—ऐसा हो जाता है उस समय इन्द्रियों के सहित मन की किरणों का हृदय में उपसंहार हो जाता है । जिस समय मन काष्ठ में व्याप्त अग्नि के समान निर्विशेष विज्ञानरूप से सम्पूर्ण शरीर को व्याप्त करके स्थित होता है उस समय वह सुषुप्तिअवस्था में पहुँच जाता है । यहाँ अर्थात् इस समय यह मन नामवाला देव स्वप्नों को नहीं देखता, क्योंकि उन्हें देखने का द्वार तेज से रुक जाता है । तदनन्तर इस शरीर में यह सुख होता है; तात्पर्य यह कि जो निराबाध और सामान्यरूप से सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त विज्ञान है वही स्फुट हो जाता है ॥ ६ ॥
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स यदा मनोरूपो देवो यस्मिन्काले सौरेण पित्ताख्येन तेजसा नाडीशयेन सर्वतोऽभिभूतो भवति तिरस्कृतवासनाद्वारो भवति तदा सह करणैः मनसो रश्मयो हृद्युपसंहृता भवन्ति । यदा मनो दार्वग्निवदविशेषविज्ञानरूपेण कृत्स्नं शरीरं व्याप्यावतिष्ठते तदा सुषुप्तो भवति । अत्रैतस्मिन्काल एष मनआख्यो देवः स्वप्नान्न पश्यति दर्शनद्वारस्य निरुद्धत्वात् तेजसा । अथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति यद्विज्ञानं निराबाधमविशेषेण शरीरव्यापकं प्रसन्नं भवतीत्यर्थः ॥ ६ ॥

इस समय अविद्या, काम और कर्मजनित शरीर एवं इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं । उनके शान्त हो जाने पर, उपाधियों के कारण अन्यरूप से भासित होनेवाला आत्मस्वरूप अद्वितीय, एक, शिव और शान्त हो जाता है । अतः पृथिवी आदि अविद्याकृत मात्राओं (विषयों)-के अनुप्रवेश द्वारा इसी अवस्था को दिखलाने के लिये दृष्टान्त दिया जाता है—
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एतस्मिन्कालेऽविद्याकामकर्मनिबन्धनानि कार्यकरणानि शान्तानि भवन्ति । तेषु शान्तेषु आत्मस्वरूपमुपाधिभिरन्यथा विभाव्यमानमद्वयमेकं शिवं शान्तं भवतीत्येतामेवावस्थां पृथिव्याद्यविद्याकृतमात्रानुप्रवेशेन दर्शयितुं दृष्टान्तमाह—