प्रश्न 4 - मन्त्र 7

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

sa yathā somya vayāṃsi vāsovṛkṣaṃ saṃpratiṣṭhante evaṃ ha vai tatsarvaṃ para ātmani saṃpratiṣṭhate .. 7 ..


हे सोम्य! जिस प्रकार पक्षी अपने बसेरे के वृक्ष पर जाकर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वह सब (कार्यकरणसंघात) सबसे उत्कृष्ट आत्मा में जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥
वह दृष्टान्त इस प्रकार है—हे सोम्य—हे प्रियदर्शन! जिस प्रकार पक्षी अपने वासोवृक्ष—बसेरे के वृक्ष की ओर प्रस्थान करते यानी जाते हैं, यह जैसा दृष्टान्त है उसी प्रकार आगे कहा जानेवाला वह सब सर्वातीत आत्मा—अक्षर में जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥
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स दृष्टान्तो यथा येन प्रकारेण सोम्य प्रियदर्शन वयांसि पक्षिणो वासार्थं वृक्षं वासोवृक्षं प्रति संप्रतिष्ठन्ते गच्छन्ति । एवं यथा दृष्टान्तो ह वै तद्वक्ष्यमाणं सर्वं पर आत्मन्यक्षरे संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

वह सब क्या है?
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किं तत्सर्वम्—