प्रश्न 4 - मन्त्र 9

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

eṣa hi draṣṭā spraṣṭā śrotā ghrātā rasayitā mantā boddhā kartā vijñānātmā puruṣaḥ sa pare’kṣara ātmani saṃpratiṣṭhate .. 9 ..


यही द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता (मनन करनेवाला), बोद्धा और कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष है । वह पर अक्षर आत्मा में सम्यक् प्रकार से स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥
यही देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, चखनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला, कर्ता, विज्ञानात्मा—जिनसे जाना जाता है वह बुद्धि आदि ज्ञान के साधनस्वरूप हैं, किन्तु यह आत्मा तो उन्हें जानता है इसलिये यह कर्ता कारकरूप विज्ञान है । यह तद्रूप—वैसे स्वभाववाला अर्थात् विज्ञातृस्वभाव है । तथा कार्यकरणसंघातरूप उपाधि में पूर्ण होने के कारण यह पुरुष है । जल में दिखायी देनेवाला सूर्य का प्रतिबिम्ब जिस प्रकार जलरूप उपाधि के नष्ट हो जाने पर सूर्य में प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार यह द्रष्टा, श्रोता आदिरूप से बतलाया गया पुरुष जगत् के आधारभूत पर अक्षर आत्मा में सम्यक्-रूप से स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥
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एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा विज्ञानं विज्ञायतेऽनेनेति करणभूतं बुद्ध्यादीदं तु विजानातीति विज्ञानं कर्तृकारकरूपं तदात्मा तत्स्वभावो विज्ञातृस्वभाव इत्यर्थः । पुरुषः कार्यकरणसंघातोक्तोपाधिपूर्णत्वात्पुरुषः । स त्र जलसूर्यकादिप्रतिबिम्बस्य सूर्यादिप्रवेशवज्जगदाधारशेषे परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

[अक्षरब्रह्म के साथ] उस विज्ञानात्मा का एकत्व जाननेवाले को जो फल मिलता है, वह बतलाते हैं—
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तदेकत्वविदः फलमाह—