प्रश्न 5 - मन्त्र 1

अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ ।
स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत ।
कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥

atha hainaṃ śaibyaḥ satyakāmaḥ papraccha .
sa yo ha vai tadbhagavanmanuṣyeṣu prāyaṇāntamoṅkāramabhidhyāyīta .
katamaṃ vāva sa tena lokaṃ jayatīti .. 1 ..


तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनि से शिबिपुत्र सत्यकाम ने पूछा—‘भगवन्! मनुष्यों में जो पुरुष प्राणप्रयाणपर्यन्त इस ओंकार का चिन्तन करे, वह उस (ओंकारोपासना)-से किस लोक को जीत लेता है? ’ ॥ १ ॥

तदनन्तर उन आचार्य पिप्पलाद से शिबि के पुत्र सत्यकाम ने पूछा; अब इससे आगे पर और अपर ब्रह्म की प्राप्ति के साधनस्वरूप ओंकारोपासना का विधान करने की इच्छा से आगे का प्रश्न प्रारम्भ किया जाता है ।

हे भगवन्! मनुष्यों में—मनुष्यजाति के बीच जो कोई आश्चर्यसदृश विरल पुरुष मरणपर्यन्त—यावज्जीवन ओंकार का अभिध्यान अर्थात् मुख्यरूप से चिन्तन करे [वह किस लोक को जीत लेता है? ] इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर और चित्त को एकाग्र कर उसे भक्ति के द्वारा जिसमें ब्रह्मभाव की प्रतिष्ठा की गयी है उस ओंकार में इस प्रकार लगा देना कि आत्मप्रत्ययसन्तति का विच्छेद न हो—भिन्नजातीय प्रतीतियों से उसमें बाधा न आवे तथा वह वायुहीन स्थान में रखे हुए दीपक की शिखा के समान स्थित हो जाय—ऐसा ध्यान ही ‘अभिध्यान’ शब्द का अर्थ है । सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, संन्यास, शौच, सन्तोष, निष्कपटता आदि अनेक यम-नियमों से सम्पन्न होकर यावज्जीवन ऐसा व्रत धारण करनेवाले को भला कौन-सा लोक प्राप्त होगा? क्योंकि ज्ञान और कर्म से प्राप्त होनेयोग्य तो बहुत-से लोक हैं, उनमें उस ओंकारचिन्तन द्वारा वह किस लोक को जीत लेता है? ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ; अथेदानीं परापरब्रह्मप्राप्तिसाधनत्वेनोङ्कारस्योपासनविधित्सया प्रश्न आरभ्यते—

स यः कश्चिद्ध वै भगवन् मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये तद् अद्भुतमिव प्रायणान्तं मरणान्तम्, यावज्जीवमित्येतत्, ओङ्कारमभिध्यायीताभिमुख्येन चिन्तयेत्, बाह्यविषयेभ्य उपसंहृतकरणः समाहितचित्तो भक्त्यावेशितब्रह्मभाव ओङ्कारे, आत्मप्रत्ययसन्तानाविच्छेदो भिन्नजातीयप्रत्ययान्तराखिलीकृतो निर्वातस्थदीपशिखासमोऽभिध्यानशब्दार्थः । सत्यब्रह्मचर्याहिंसापरिग्रहत्यागसंन्यासशौचसन्तोषामायावित्वाद्यनेकयमनियमानुगृहीतः स एवं यावज्जीवव्रतधारणः कतमं वाव, अनेके हि ज्ञानकर्मभिर्जेतव्या लोकास्तिष्ठन्ति तेषु तेनोङ्काराभिध्यानेन कतमं स लोकं जयति ॥ १ ॥