प्रश्न 5 - मन्त्र 2

तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः ।
तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥

tasmai sa hovāca etadvai satyakāma paraṃ cāparaṃ ca brahma yadoṅkāraḥ .
tasmādvidvānetenaivāyatanenaikataramanveti .. 2 ..


उससे उस पिप्पलाद ने कहा—हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है । अतः विद्वान् इसी के आश्रय से उनमें से किसी एक [ब्रह्म]-को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
इस प्रकार पूछनेवाले सत्यकाम से पिप्पलाद ने कहा—हे सत्यकाम! यह पर और अपर ब्रह्म; पर अर्थात् सत्य अक्षर अथवा पुरुषसंज्ञक ब्रह्म तथा जो प्रथम विकाररूप प्राण नामक अपर ब्रह्म है वह ओंकार ही है; अर्थात् ओंकाररूप प्रतीकवाला होने से ओंकारस्वरूप ही है । परब्रह्म शब्दादि से उपलक्षित होने के अयोग्य और सब प्रकार के विशेष धर्मों से रहित है; अतः इन्द्रिय-गोचरता से अतीत होने के कारण केवल मन से उसका अवगाहन नहीं किया जा सकता; किंतु विष्णु आदि की प्रतिमास्थानीय ओंकार में जिसमें कि भक्ति के द्वारा ब्रह्म-भाव की स्थापना की गयी है, ध्यान करनेवालों के प्रति प्रसन्न होता है—यह बात शास्त्रप्रमाण से जानी जाती है । इसी प्रकार अपर ब्रह्म भी [ओंकार में ध्यान करनेवालों के प्रति प्रसन्न होता है] । अतः पर और अपर ब्रह्म ओंकार ही है—ऐसा उपचार से कहा जाता है । सुतरां, विद्वान् आत्मप्राप्ति के इस ओंकारचिन्तनरूप साधन से ही पर या अपर किसी एक ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, क्योंकि ओंकार ही ब्रह्म का सबसे अधिक समीपवर्ती आलम्बन है ॥ २ ॥
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इति पृष्टवते तस्मै स होवाच पिप्पलादः—एतद्वै सत्यकाम! एतद्ब्रह्म वै परं चापरं च ब्रह्म परं सत्यमक्षरं पुरुषाख्यमपरं च प्राणाख्यं प्रथमजं यत्तदोङ्कार एवोङ्कारात्मकमोङ्कारप्रतीकत्वात् । परं हि ब्रह्म शब्दाद्युपलक्षणानर्हं सर्वधर्मविशेषवर्जितमतो न शक्यमतीन्द्रियगोचरत्वात्केवलेन मनसावगाहितुम् । ओङ्कारे तु विष्णवादिप्रतिमास्थानीये भक्त्यावेशितब्रह्मभावे ध्यायिनां तत्प्रसीदति इत्येतदवगम्यते शास्त्रप्रामाण्यात् तथापरं च ब्रह्म । तस्मात्परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कार इत्युपचर्यते । तस्मादेवं विद्वानेतेनैवात्मप्राप्तिसाधनेनैवोङ्काराभिध्यानेन एकतरं परमपरं वान्वेति ब्रह्मानुगच्छति नेदिष्ठं ह्यालम्बनमोङ्कारो ब्रह्मणः ॥ २ ॥