प्रश्न 5 - मन्त्र 3

स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते ।
तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥

sa yadyekamātramabhidhyāyīta sa tenaiva saṃveditastūrṇameva jagatyāmabhisampadyate .
tamṛco manuṣyalokamupanayante sa tatra tapasā brahmacaryeṇa śraddhayā sampanno mahimānamanubhavati .. 3 ..


वह यदि एकमात्राविशिष्ट ओंकार का ध्यान करता है तो उसी से बोध को प्राप्त कर तुरंत ही संसार को प्राप्त हो जाता है । उसे ऋचाएँ मनुष्यलोक में ले जाती हैं । वहाँ वह तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से सम्पन्न होकर महिमा का अनुभव करता है ॥ ३ ॥

यद्यपि वह ओंकार की समस्त मात्राओं का ज्ञाता नहीं होता; तो भी ओंकार के चिन्तन के प्रभाव से वह विशिष्ट गति को ही प्राप्त होता है । अर्थात् ओंकार की शरण में प्राप्त हुआ पुरुष इसके एकांश ज्ञानरूप दोष से कर्म और ज्ञान दोनों से भ्रष्ट होकर दुर्गति को प्राप्त नहीं होता । तो फिर क्या होता है? वह इस प्रकार यदि ओंकार की केवल एकमात्रा का ज्ञाता होकर केवल एकमात्राविशिष्ट ओंकार का ही अभिध्यान यानी सर्वदा चिन्तन करता है तो वह उस एकमात्राविशिष्ट ओंकार के ध्यान से ही संवेदित अर्थात् बोध प्राप्त कर तत्काल जगती यानी पृथिवीलोक में प्राप्त हो जाता है ।

[पृथिवीलोक में] किसे प्राप्त होता है? मनुष्यलोक को; क्योंकि संसार में तो अनेक प्रकार के जन्म हो सकते हैं । उनमें से संसार में उस साधक को ऋचाएँ मनुष्यलोक को ही ले जाती हैं, क्योंकि ओंकार की ध्यान की हुई पहली एकमात्रा(अ) ऋग्वेदरूपा है । इससे उस मनुष्यजन्म में वह द्विजश्रेष्ठ होकर तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से सम्पन्न हो महिमा यानी विभूति का अनुभव करता है—श्रद्धाहीन होकर स्वेच्छाचारी नहीं होता । ऐसा योगभ्रष्ट कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स यद्यप्योङ्कारस्य सकलमात्राविभागज्ञो न भवति तथापि ओङ्काराभिध्यानप्रभावाद्विशिष्टामेव गतिं गच्छति; एतदेकदेशज्ञानवैगुण्यतयोङ्कारशरणः कर्मज्ञानोभयभ्रष्टो न दुर्गतिं गच्छति । किं तर्हि? यद्यप्येवम् ओङ्कारमेवैकमात्राविभागज्ञ एव केवलोऽभिध्यायीतैकमात्रं सदा ध्यायीत स तेनैवैकमात्राविशिष्टोङ्काराभिध्यानेनैव संवेदितः सम्बोधितस्तूर्णं क्षिप्रमेव जगत्यां पृथिव्यामभिसम्पद्यते ।

किम्? मनुष्यलोकम् । अनेकानि हि जन्मानि जगत्यां सम्भवन्ति । तत्र तं साधकं जगत्यां मनुष्यलोकमेवर्च्च उपनयन्त उपनिगमयन्ति । ऋच ऋग्वेदरूपा ह्योङ्कारस्य प्रथमैकमात्राभिध्याता । तेन स तत्र मनुष्यजन्मनि द्विजाग्र्यः संस्तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया च संपन्नो महिमानं विभूतिमनुभवति न वीतश्रद्धो यथेष्टचेष्टो भवति योगभ्रष्टः कदाचिदपि न दुर्गतिं गच्छति ॥ ३ ॥