अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् ।
स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥
स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥
atha yadi dvimātreṇa manasi sampadyate so’ntarikṣaṃ yajurbhirunnīyate somalokam .
sa somaloke vibhūtimanubhūya punarāvartate .. 4 ..
और यदि वह द्विमात्राविशिष्ट ओंकार के चिन्तन द्वारा मन से एकत्व को प्राप्त हो जाता है तो उसे यजुःश्रुतियाँ अन्तरिक्षस्थित सोमलोक में ले जाती हैं । तदनन्तर सोमलोक में विभूति का अनुभव कर वह फिर लौट आता है ॥ ४ ॥
और यदि वह दो मात्राओं (अ, उ)-के विभाग का ज्ञाता होकर द्विमात्राविशिष्ट ओंकार का चिन्तन करता है तो वह सोम ही जिसका देवता है उस स्वप्नात्मक यजुर्वेदस्वरूप मननीय मन को प्राप्त होता है अर्थात् एकाग्रता द्वारा उसके आत्मभाव को प्राप्त हो जाता है [यानी उसे ही अपना-आप मानने लगता है] । इस अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होनेपर वह अन्तरिक्षाधार द्वितीयमात्रारूप सोमलोक में द्वितीयमात्रारूप यजुः-श्रुतियों द्वारा सोमलोक को ले जाया जाता है । अर्थात् यजुःश्रुतियाँ उसे सोमलोकसम्बन्धी जन्म प्राप्त कराती हैं । उस सोमलोक में विभूति का अनुभव कर वह फिर मनुष्यलोक में लौट आता है ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथ पुनर्यदि द्विमात्राविभागज्ञो द्विमात्रेण विशिष्टमोङ्कारम् अभिध्यायीत स्वप्नात्मके मनसि मननीये यजुर्मये सोमदैवत्ये सम्पद्यत एकाग्रतयात्मभावं गच्छति स एवं सम्पन्नो मृतोऽन्तरिक्षम् अन्तरिक्षाधारं द्वितीयमात्रारूपं द्वितीयमात्रारूपैरेव यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकं सौम्यं जन्म प्रापयन्ति तं यजूंषीत्यर्थः । स तत्र विभूतिमनुभूय सोमलोके मनुष्यलोकं प्रति पुनरावर्तते ॥ ४ ॥