प्रश्न 5 - मन्त्र 5

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः ।
यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥

yaḥ punaretaṃ trimātreṇomityetenaivākṣareṇa paraṃ puruṣamabhidhyāyīta sa tejasi sūrye saṃpannaḥ .
yathā pādodarastvacā vinirmucyata evaṃ ha vai sa pāpmanā vinirmuktaḥ sa sāmabhirunnīyate brahmalokaṃ sa etasmājjīvaghanātparātparaṃ puriśayaṃ puruṣamīkṣate tadetau ślokau bhavataḥ .. 5 ..


किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ‘ॐ’ इस अक्षर द्वारा इस परमपुरुष की उपासना करता है वह तेजोमय सूर्यलोक को प्राप्त होता है । सर्प जिस प्रकार केंचुली से निकल आता है उसी प्रकार वह पापों से मुक्त हो जाता है । वह सामश्रुतियों द्वारा ब्रह्मलोक में ले जाया जाता और इस जीवनघन से भी उत्कृष्ट हृदयस्थित परमपुरुष का साक्षात्कार करता है । इस सम्बन्ध में ये दो श्लोक हैं ॥ ५ ॥
परन्तु जो पुरुष इस तीन मात्राओंवाले—तीन मात्राविषयक विज्ञान से युक्त ‘ॐ’ इस अक्षरात्मक प्रतीकरूप से पर अर्थात् सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुष का चिन्तन करता है वह उस चिन्तन के द्वारा ही ध्यान करता हुआ तृतीय मात्रारूप होकर तेजोमय सूर्यलोक में स्थित हो जाता है । वह मृत्यु के पश्चात् भी चन्द्रलोकादि के समान सूर्यलोक से लौटकर नहीं आता, बल्कि सूर्य में लीन हुआ ही स्थित रहता है । ‘परं चापरं च ब्रह्म’ इस अभेदश्रुति द्वारा ओंकार का प्रतीकरूप से आलम्बनत्व बतलाया गया है [ब्रह्मप्राप्ति में उसका साधनत्व नहीं बतलाया गया] । अन्यथा बहुत-सी श्रुतियों में जो ‘ओंकारम्’ ऐसी द्वितीया विभक्ति आयी है वह बाधित हो जायगी । यद्यपि ‘ओमित्येतेन’ इस पद में तृतीया विभक्ति होने के कारण इसका करणत्व (साधनत्व) मानना भी ठीक है तथापि “त्यजेदेकं कुलस्यार्थे” (कुल के हित के लिये एक व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिये) इस न्याय से प्रकरण के अनुसार इसे ‘त्रिमात्रं परं पुरुषम्’ इस प्रकार द्वितीया विभक्ति में ही परिणत कर लेना चाहिये । जिस प्रकार पादोदर—सर्प केंचुली से छूट जाता है, और वह जीर्ण त्वचा से छूटकर पुनः नवीन हो जाता है, उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, वह साधक सर्प की केंचुलीरूप अशुद्धिमय पाप से मुक्त हो तृतीय मात्रारूप सामश्रुतियों द्वारा ऊपर की ओर ब्रह्मलोक को यानी हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा के सत्य नामक लोक को ले जाया जाता है । वह हिरण्यगर्भ सम्पूर्ण संसारी जीवों का आत्मस्वरूप है । वही लिंगदेहरूप से समस्त जीवों का अन्तरात्मा है । उस लिंगात्मा हिरण्यगर्भ में ही समस्त जीव संहत हैं । अतः वह जीवघन है । वह त्रिमात्र ओंकार का ज्ञाता एवं ध्यान करनेवाला विद्वान् इस उत्तम जीवघनस्वरूप हिरण्यगर्भ से भी श्रेष्ठ तथा पुरिशय—सम्पूर्ण शरीरों में अनुप्रविष्ट परमात्मा-संज्ञक पुरुष को देखता है । इस उपर्युक्त अर्थ को ही प्रकाशित करनेवाले ये दो श्लोक यानी मन्त्र हैं ॥ ५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यः पुनरेतमोङ्कारं त्रिमात्रेण त्रिमात्राविषयविज्ञानविशिष्टेन ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं सूर्यान्तर्गतं पुरुषं प्रतीकेनाभिध्यायीत तेनाभिध्यानेन, प्रतीकत्वेन ह्यालम्बनत्वं प्रकृतम् ओङ्कारस्य परं चापरं च ब्रह्मेत्यभेदश्रुतेरोङ्कारमिति च द्वितीयानेकशः श्रुता बाध्येतान्यथा यद्यपि तृतीयाभिध्यानत्वेन करणत्वमुपपद्यते तथापि प्रकृतानुरोधात्त्रिमात्रं परं पुरुषमिति द्वितीयैव परिणेया “त्यजेदेकं कुलस्यार्थे” (महा० उ० ३७ । १७) इति न्यायेन । स तृतीयमात्रारूपस्तेजसि सूर्ये संपन्नो भवति ध्यायमानो मृतोऽपि सूर्यात्सोमलोकादिवन्न पुनरावर्तते किन्तु सूर्ये संपन्नमात्र एव । यथा पादोदरः सर्पस्त्वचा विनिर्मुच्यते जीर्णत्वग्विनिर्मुक्तः स पुनर्नवो भवति । एवं ह वा एष यथा दृष्टान्तः स पाप्मना सर्पत्वक्स्थानीयेनाशुद्धिरूपेण विनिर्मुक्तः सामभिस्तृतीयमात्रारूपैरुर्ध्वमुन्नीयते ब्रह्मलोकं हिरण्यगर्भस्य ब्रह्मणो लोकं सत्याख्यम् । स हिरण्यगर्भः सर्वेषां संसारिणां जीवानामात्मभूतः । स ह्यन्तरात्मा लिङ्गरूपेण सर्वभूतानाम्, तस्मिन्हि लिङ्गात्मनि संहताः सर्वे जीवाः । तस्मात्स जीवघनः । स विद्वांस्त्रिमात्रोङ्काराभिज्ञ एतस्माज्जीवघनाद्धिरण्यगर्भात्परात्परं परमात्माख्यं पुरुषमीक्षते पुरिशयं सर्वशरीरानुप्रविष्टं पश्यति ध्यायमानः । तदेतस्मिन्यथोक्तार्थप्रकाशकौ मन्त्रौ भवतः ॥ ५ ॥