क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥
tisro mātrā mṛtyumatyaḥ prayuktā anyonyasaktā anaviprayuktāḥ .
kriyāsu bāhyābhyantaramadhyamāsu samyakprayuktāsu na kampate jñaḥ .. 6 ..
ओंकार की अकार, उकार और मकार—ये तीन मात्राएँ मृत्युमती हैं । जिनकी मृत्यु विद्यमान है—जो मृत्यु की पहुँच से परे नहीं हैं अर्थात् मृत्यु की विषयभूता ही हैं उन्हें मृत्युमती कहते हैं । वे आत्मा की ध्यानक्रियाओं में प्रयुक्त होती हैं; और अन्योन्यसक्त यानी एकदूसरी से सम्बद्ध हैं [तथा] वे ‘अनविप्रयुक्ता’ हैं—जो विशेषरूप से एक विषय में ही प्रयुक्त हों वे ‘विप्रयुक्ता’ कहलाती हैं, तथा जो विप्रयुक्ता न हों उन्हें ‘अविप्रयुक्ता’ कहते हैं और जो अविप्रयुक्ता नहीं हैं वे ही ‘अनविप्रयुक्ता’ कहलाती हैं ।
तो इससे क्या सिद्ध हुआ? इस प्रकार विशेषरूप से एक ही बाह्य, आभ्यन्तर और मध्यम तीन क्रियाओं में यानी ध्यानकाल में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के अभिमानी [विश्व, तैजस और प्राज्ञ अथवा समष्टिरूप से विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—इन तीनों] पुरुषों के अभिध्यानरूप योगक्रियाओं के सम्यक् प्रयोग किये जानेपर—सम्यक् ध्यानकाल में प्रयोजित होनेपर ज्ञानी—योगी अर्थात् ओंकार की मात्राओं के पूर्वोक्त विभाग को जाननेवाला साधक विचलित नहीं होता । इस प्रकार जाननेवाले उस योगी का विचलित होना सिद्ध नहीं होता । क्योंकि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के अभिमानी पुरुष अपने स्थानों के सहित मात्रात्रयरूप ओंकार स्वरूप से देखे जा चुके हैं । इस प्रकार सर्वात्मभूत और ओंकारस्वरूपता को प्राप्त हुआ वह विद्वान् कहाँ से और किसके प्रति विचलित होगा? ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तिस्रस्त्रिसंख्याका अकारोकारमकाराख्या ओङ्कारस्य मात्रा मृत्युमत्यो मृत्युर्यासां विद्यते ता मृत्युमत्यो मृत्युगोचरादनतिक्रान्ता मृत्युगोचरा एवेत्यर्थः । ता आत्मनो ध्यानक्रियासु प्रयुक्ताः, किं चान्योन्यसक्ता इतरेतरसंबद्धाः, अनविप्रयुक्ता विशेषेणैकैकविषय एव प्रयुक्ता विप्रयुक्ताः, न तथा विप्रयुक्ता अविप्रयुक्ता नाविप्रयुक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
किं तर्हि, विशेषेणैकस्मिन्ध्यानकाले तिसृषु क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तस्थानपुरुषाभिध्यानलक्षणासु योगक्रियासु सम्यक्प्रयुक्तासु सम्यग्ध्यानकाले प्रयोजितासु न कम्पते न चलति ज्ञो योगी यथोक्तविभागज्ञ ओङ्कारस्येत्यर्थः, न तस्यैवंविदश्चलनमुपपद्यते । यस्माज्जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तपुरुषाः सह स्थानैर्मात्रात्रयरूपेण ओङ्कारात्मरूपेण दृष्टाः । स ह्येवं विद्वान्सर्वात्मभूत ओङ्कारमयः कुतो वा चलेत्कस्मिन्वा ॥ ६ ॥