प्रश्न 5 - मन्त्र 7

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते ।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७ ॥

ṛgbhiretaṃ yajurbhirantarikṣaṃ sāmabhiryattatkavayo vedayante .
tamoṅkāreṇaivāyatanenānveti vidvān yattacchāntamajaramamṛtamabhayaṃ paraṃ ceti .. 7 ..


साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा अन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विज्ञजन जानते हैं । तथा उस ओंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है ॥ ७ ॥

ऋग्वेद द्वारा इस मनुष्योपलक्षित लोक को, यजुर्वेद द्वारा सोमाधिष्ठित अन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस तृतीय ब्रह्मलोक को, जिसे कि कवि, मेधावी अर्थात् विद्वान्लोग ही जानते हैं—अविद्वान् नहीं; इस क्रम से ओंकाररूप साधन के द्वारा ही विद्वान् अपरब्रह्मस्वरूप इस त्रिविध लोक को प्राप्त हो जाता है अर्थात् इन तीनों का अनुगमन करता है ।

उस ओंकार से ही वह उस अक्षर सत्य और पुरुषसंज्ञक परब्रह्म को प्राप्त होता है जो शान्त अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि विशेषभाव से मुक्त तथा सब प्रकार के प्रपंच से रहित है, इसलिये जो अजर—जराशून्य अतः अमृत—मृत्युरहित है । क्योंकि वह जरा आदि विकारों से रहित है इसलिये अभयरूप है । और अभय होने के कारण ही पर—निरतिशय है । तात्पर्य यह कि उसे भी वह ओंकाररूप आलम्बन यानी गमन-साधन के द्वारा ही प्राप्त होता है । मन्त्र के अन्त में ‘इति’ शब्द वाक्य की परिसमाप्ति के लिये है ॥ ७ ॥

तात्पर्य पढ़ें

ऋग्भिरेतं लोकं मनुष्योपलक्षितम् । यजुर्भिरन्तरिक्षं सोमाधिष्ठितम् । सामभिर्यत्तद् ब्रह्मलोकमिति तृतीयं कवयो मेधाविनो विद्यावन्त एव नाविद्वांसो वेदयन्ते । तं त्रिविधं लोकमोङ्कारेण साधनेनापरब्रह्मलक्षणमन्वेत्यनुगच्छति विद्वान् ।

तेनैवोङ्कारेण यत्तत्परं ब्रह्माक्षरं सत्यं पुरुषाख्यं शान्तं विमुक्तं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिविशेषसर्वप्रपञ्चविवर्जितमत एव अजरं जरावर्जितममृतं मृत्युवर्जितमत एव यस्माज्जराविक्रियारहितमतोऽभयम्, यस्मादेव अभयं तस्मात्परं निरतिशयम्; तदप्योङ्कारेणायतनेन गमनसाधनेनान्वेतीत्यर्थः । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ॥ ७ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये पंचमः प्रश्नः ॥ ५ ॥


षष्ठ प्रश्न