इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥
tasmai sa hovāca .
ihaivāntaḥśarīre somya sa puruṣo yasminnetāḥ ṣoḍaśa kalāḥ prabhavantīti .. 2 ..
उससे उस (पिप्पलादाचार्य)-ने कहा—हे सोम्य! उस पुरुष को यहीं—इस शरीर के भीतर हृदयपुण्डरीकाकाश में ही जानना चाहिये—किसी अन्य देश (स्थान)-में नहीं, जिस (पुरुष)-में कि इन आगे कही जानेवाली प्राण आदि सोलह कलाओं का प्रादुर्भाव होता है अर्थात् जिससे ये उत्पन्न होती हैं । इन उपाधिभूत सोलह कलाओं के कारण वह पुरुष कलाहीन होकर भी अविद्यावश कलावान्-सा दिखलायी देता है । उन औपाधिक कलाओं के अध्यारोप की विद्या से निवृत्ति करके उस पुरुष को शुद्ध दिखलाना है इसलिये प्राणादि कलाओं को उसीसे उत्पन्न होनेवाली कहा है, क्योंकि अत्यन्त निर्विशेष, अद्वय और विशुद्ध तत्त्व में अध्यारोप के बिना प्रतिपाद्य-प्रतिपादन आदि कोई व्यवहार नहीं किया जा सकता । इसलिये उसमें कलाओं के अविद्याविषयक उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का आरोप किया जाता है, क्योंकि ये कलाएँ चैतन्य से अभिन्न रहकर ही सर्वदा उत्पन्न, स्थित तथा लीन होती देखी जाती हैं ।
इसीसे कुछ भ्रान्त पुरुषों का मत है कि ‘अग्नि के संयोग से घृत के समान चैतन्य ही प्रत्येक क्षण में घट आदि आकारों में उत्पन्न और नष्ट हो रहा है ।’ इनसे भिन्न दूसरों (शून्यवादियों)-का मत है कि ‘इनका निरोध हो जाने पर सब कुछ शून्यमय हो जाता है ।’ तथा अन्य (नैयायिक) कहते हैं कि ‘चेतयिता नित्य आत्मा की घटादि को विषय करनेवाली अनित्य चेतनता उत्पन्न और नष्ट होती रहती है, तथा लौकायतिकों (देहात्मवादियों)-का कथन है कि ‘चेतनता भूतों का धर्म है ।’ परन्तु ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’, ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’, ‘विज्ञानघन एव’ इत्यादि श्रुतियों से यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति-नाशरूप धर्म से रहित चेतन ही आत्मा है; वही नाम-रूप आदि औपाधिक धर्मों से युक्त भास रहा है । अपने स्वरूप से व्यभिचारी (बदलनेवाले) पदार्थों में चैतन्य का व्यभिचार (परिवर्तन) न होने के कारण जो पदार्थ जिसजिस प्रकार जाना जाता है उसके उसउस प्रकार जाने जाने के कारण ही उसउस पदार्थ के चैतन्य का अव्यभिचार सिद्ध होता है ।[ * ]
> [ * ]: क्योंकि ज्ञान को किसी का ज्ञेय न मानने से उसका व्यवहार ही सिद्ध नहीं हो सकता ।
‘कोई वस्तुतत्त्व है तो सही किन्तु जाना नहीं जाता’ ऐसा कहना तो ‘रूप तो दिखलायी देता है परन्तु नेत्र नहीं है’ इस कथन के समान अयुक्त ही है । ज्ञेय का तो ज्ञान में व्यभिचार होता है किन्तु ज्ञान का ज्ञेय में कभी व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि एक ज्ञेय का अभाव होने पर भी ज्ञेयान्तर में ज्ञान का सद्भाव रहता ही है; ज्ञान के अभाव में तो ज्ञेय किसी के लिये रहता ही नहीं, जैसा कि सुषुप्ति में उनका अभाव देखा जाता है ।
मध्यस्थ—सुषुप्ति में तो ज्ञान का भी अभाव है; अतः उस समय ज्ञेय के समान ज्ञान के स्वरूप का भी व्यभिचार होता है ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं । ज्ञेय का अवभासक ज्ञान प्रकाश के समान ज्ञेय की अभिव्यक्ति का कारण है; अतः प्रकाश्य वस्तुओं के अभाव में जिस प्रकार प्रकाश का अभाव नहीं माना जाता उसी प्रकार सुषुप्ति में वस्तुओं की प्रतीति न होने से विज्ञान का अभाव मानना ठीक नहीं । अन्धकार में रूप की उपलब्धि न होने पर वैनाशिक [क्षणिक विज्ञानवादी] भी नेत्र के अभाव की कल्पना नहीं कर सकता ।
मध्यस्थ—परन्तु वैनाशिक तो ज्ञेय के अभाव में ज्ञान के अभाव की कल्पना करता ही है ।
सिद्धान्ती—उस वैनाशिक को यह बतलाना चाहिये कि जिस [ज्ञान]-से ज्ञेय के अभाव की कल्पना की जाती है उसका अभाव किससे कल्पना किया जाता है? क्योंकि उस [ज्ञान]-का अभाव भी ज्ञेयरूप होने के कारण बिना ज्ञान के सिद्ध नहीं हो सकता ।
मध्यस्थ—ज्ञान ज्ञेय से अभिन्न है, इसलिये ज्ञेय के अभाव में ज्ञान का भी अभाव हो जाता है—ऐसा मानें तो?
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अभाव भी ज्ञेयरूप माना गया है । वैनाशिकों ने अभाव को भी ज्ञेय और नित्य स्वीकार किया है । यदि ज्ञान उससे [ज्ञेय से] अभिन्न है तो वह [उनके मत में भी] नित्य मान लिया जाता है । तथा उसका अभाव भी ज्ञानस्वरूप होने के कारण उसका अभावत्व नाममात्र को ही रहता है, वास्तव में ज्ञान का अभावत्व एवं अनित्यत्व सिद्ध नहीं होता । नित्यज्ञान का केवल ‘अभाव’ नाम रख देने से ही हमारा कुछ बिगड़ नहीं जाता ।
मध्यस्थ—किन्तु यदि अभाव ज्ञेय होने पर भी ज्ञान से भिन्न माना जाय तो?
सिद्धान्ती—तब तो ज्ञेय का अभाव होने पर ज्ञान का अभाव हो ही नहीं सकता ।
मध्यस्थ—परन्तु ज्ञेय ही ज्ञान से भिन्न माना जाय, ज्ञान ज्ञेय से भिन्न न माना जाय तो?
सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि यह कथन केवल शब्दमात्र होने से इसमें कोई विशेषता नहीं है । यदि तुम ज्ञान और ज्ञेय की अभिन्नता मानते हो तो ‘ज्ञेय ज्ञान से भिन्न है किन्तु ज्ञान ज्ञेय से भिन्न नहीं है’ यह कथन इसी प्रकार केवल शब्दमात्र है जैसे यह मानना कि ‘वह्नि अग्नि से भिन्न है, परन्तु अग्नि वह्नि से भिन्न नहीं है ।’ अतः यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान ज्ञेय से व्यतिरिक्त होने के कारण ज्ञेय का अभाव होने पर ज्ञान का अभाव नहीं माना जा सकता ।
मध्यस्थ—परन्तु ज्ञेय का अभाव हो जाने पर तो प्रतीत न होने के कारण ज्ञान का भी अभाव हो जाता है?
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्ति में ज्ञप्ति का अस्तित्व माना गया है—वैनाशिकों ने सुषुप्ति में भी विज्ञान का अस्तित्व स्वीकार किया ही है ।
मध्यस्थ—परन्तु उस अवस्था में भी ज्ञान का ज्ञेयत्व स्वयं अपने से [ज्ञान से] ही माना जाता है ।[ * ]
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन [ज्ञान और ज्ञेय]-का भेद सिद्ध हो ही चुका है । अभावरूप विज्ञेयविषयक ज्ञान अभावरूप ज्ञेय से भिन्न होने के कारण ज्ञेय और ज्ञान की भिन्नता पहले सिद्ध हो ही चुकी है । उस सिद्ध हुई बात को, मृतक को पुनः जीवित करने के समान, सैकड़ों वैनाशिक भी अन्यथा नहीं कर सकते ।
पूर्व०—ज्ञान को किसी अन्य ज्ञेय की अपेक्षा है—यदि ऐसा मानें तो तेरे पक्ष में ‘वह ज्ञान किसी अन्य का ज्ञेय है और वह किसी अन्य का’ ऐसा मानने से अनवस्थादोष होगा ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुओं का [ज्ञान और ज्ञेयरूप से] विभाग किया जा सकता है । जब कि सब वस्तुएँ किसी एकही की ज्ञेय हैं तो उनसे भिन्न [उनका प्रकाशक] ज्ञान तो ज्ञान ही रहता है ।
यह वैनाशिकों से इतर मतावलम्बियों ने दूसरा ही विभाग माना है । इस विषय में कोई तीसरा विभाग नहीं माना गया । अतः उनके मत में अनवस्था नहीं आ सकती ।
पूर्व०—यदि ज्ञान को अपने से ही ज्ञेय न माना जायगा तो उसके सर्वज्ञत्व की हानि होगी ।
सिद्धान्ती—यह दोष भी उस [वैनाशिक]-का ही हो सकता है; हमें उसे रोकने की क्या आवश्यकता है? अनवस्थादोष भी ज्ञान का ज्ञेयत्व मानने से ही है । वैनाशिकों के मत में ज्ञान ज्ञेय तो अवश्य ही है; अतः अपना ही ज्ञेय न हो सकने के कारण उसकी अनवस्था भी अनिवार्य ही है ।
पूर्व०—यह दोष तो तुम्हारे पक्ष में भी ऐसा ही है ।[ * ]
सिद्धान्ती—नहीं, ज्ञान का एकत्व सिद्ध हो जाने के कारण [हमारे मत में ऐसा कोई दोष नहीं आ सकता; हम तो मानते हैं कि] सम्पूर्ण देश, काल और पुरुष आदि अवस्थाओं में जलादि में प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदि के समान एक ही ज्ञान अनेक प्रकार से भासित हो रहा है । अतः [हमारे मत में] यह दोष नहीं है । इसीसे यहाँ यह [कलाओं के प्रादुर्भाव की] बात कही गयी है ।
पूर्व०—परन्तु इस श्रुति के अनुसार तो पुरुष, कूँड़े में बेर के समान इस शरीर में ही परिच्छिन्न है ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि पुरुष प्राणादि कलाओं का कारण है; और जो शरीरमात्र से परिच्छिन्न होगा उसे प्राण एवं श्रद्धादि कलाओं के कारण-रूप से कोई नहीं जान सकता, क्योंकि शरीर तो उन कलाओं का ही कार्य है । पुरुष की कार्यरूप कलाओं का कार्य होकर शरीर अपने कारण के कारण पुरुष को, कूँड़े में बेर के समान, अपने भीतर नहीं कर सकता ।
पूर्व०—यदि बीज और वृक्षादि के समान ऐसा हो सकता हो तो? जिस प्रकार बीज का कार्य वृक्ष है और उसका कार्य आम्रादि फल अपने कारण के कारण बीज को अपने भीतर कर लेता है उसी प्रकार अपने कारण का कारण होने पर भी शरीर पुरुष को अपने भीतर कर लेगा—ऐसा मानें तो?
सिद्धान्ती—[पूर्वबीज से] अन्य और सावयव होने के कारण यह दृष्टान्त ठीक नहीं है । दृष्टान्त में कारणरूप बीज से वृक्ष के फल से ढँके हुए बीज भिन्न ही हैं, किन्तु दार्ष्टान्त में तो अपने कारण का कारणरूप वही पुरुष शरीर के भीतर हुआ सुना जाता है । इसके सिवा सावयव होने के कारण भी बीज और वृक्षादि में परस्पर आधार-आधेयभाव हो सकता है । किन्तु इधर पुरुष तो निरवयव है तथा कलाएँ और शरीर सावयव हैं । इससे तो शरीर आकाश का भी आधार नहीं बन सकता, फिर आकाश के भी कारणस्वरूप पुरुष की तो बात ही क्या है । इसलिये यह दृष्टान्त विषम है ।
मध्यस्थ—दृष्टान्त से क्या है? श्रुति के वचन से तो ऐसा ही होना चाहिये ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वचन कुछ करनेवाला नहीं है । किसी वस्तु को कुछ-का-कुछ कर देने के लिये वचन प्रवृत्त नहीं हुआ करता । तो फिर वह क्या करता है? वह तो ज्यों-की-त्यों वस्तु दिखलाने में ही प्रवृत्त होता है । अतः ‘अन्तःशरीरे’ इस वचन को ‘अण्डे के भीतर आकाश’ इस कथन के समान ही समझना चाहिये ।
इसके सिवा उपलब्धि का कारण होने से भी [ऐसा कहा गया है] । दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान [जानना] आदि लिंगों से पुरुष शरीर के भीतर परिच्छिन्न-सा दिखलायी देता है, तथा इस [शरीर]-में ही उसकी उपलब्धि भी होती है । इसीलिये यह कहा गया है कि ‘हे सोम्य! वह पुरुष इस शरीर के भीतर है ।’ नहीं तो, आकाश का भी कारण होकर वह कूँड़े में बेर के समान शरीर में परिच्छिन्न है—ऐसी बात कहने की तो कोई मूढ पुरुष भी अपने मन से भी इच्छा नहीं कर सकता, फिर प्रमाणभूता श्रुति की तो बात ही क्या है? ॥ २ ॥
तात्पर्य पढ़ें
तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे हृदयपुण्डरीकाकाशमध्ये हे सोम्य स पुरुषो न देशान्तरे विज्ञेयो यस्मिन्नेता उच्यमानाः षोडश कलाः प्राणाद्याः प्रभवन्ति उत्पद्यन्त इति षोडशकलाभिः उपाधिभूताभिः सकल इव निष्कलः पुरुषो लक्ष्यतेऽविद्ययेति तदुपाधिकलाध्यारोपापनयेन विद्यया स पुरुषः केवलो दर्शयितव्य इति कलानां तत्प्रभवत्वमुच्यते । प्राणादीनामत्यन्तनिर्विशेषे ह्यद्वये शुद्धे तत्त्वे न शक्योऽध्यारोपमन्तरेण प्रतिपाद्यप्रतिपादनादिव्यवहारः कर्तुमिति कलानां प्रभवस्थित्यप्यया आरोप्यन्ते अविद्याविषयाः । चैतन्याव्यतिरेकेणैव हि कला जायमानाः तिष्ठन्त्यः प्रलीयमानाश्च सर्वदा लक्ष्यन्ते ।
अत एव भ्रान्ताः केचिद् आत्मचैतन्ये अग्निसंयोगाद् घृतमिव विकल्पाः घटाद्याकारेण चैतन्यम् एव प्रतिक्षणं जायते नश्यतीति । तन्निरोधे शून्यमिव सर्वमित्यपरे । घटादिविषयं चैतन्यं चेतयितुर्नित्यस्यात्मनोऽनित्यं जायते विनश्यतीत्यपरे । चैतन्यं भूतधर्म इति लोकायतिकाः । अनपायोपजनधर्मकचैतन्यमात्मा एव नामरूपाद्युपाधिधर्मैः प्रत्यवभासते “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २ । १ । १) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ३ । १ । ३) “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ९ । २८) “विज्ञानघन एव” (बृ० उ० २ । ४ । १२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । स्वरूपव्यभिचारिषु पदार्थेषु चैतन्यस्याव्यभिचाराद्यथा यथा यो यः पदार्थो विज्ञायते तथा तथा ज्ञायमानत्वादेव तस्य तस्य चैतन्यस्याव्यभिचारित्वम् ।
वस्तुतत्त्वं भवति किञ्चित्; न ज्ञायत इति चानुपपन्नम्, ज्ञेयवस्तुनि रूपं च दृश्यते न ज्ञानस्य चास्ति चक्षुरिति यथा । अव्यभिचारो भवति व्यभिचरति तु ज्ञेयम्; न ज्ञानं व्यभिचरति कदाचिदपि ज्ञेयम्, ज्ञेयाभावेऽपि ज्ञेयान्तरे भावाज्ज्ञानस्य । न हि ज्ञानेऽसति ज्ञेयं नाम भवति कस्यचित्; सुषुप्तेऽदर्शनात् ।
ज्ञानस्यापि सुषुप्तेऽभावाज्ज्ञेयवज्ज्ञानस्वरूपस्य व्यभिचार इति चेत् ।
न, ज्ञेयावभासकस्य ज्ञानस्यालोकवसुषुप्तौ ज्ज्ञेयाभिव्यञ्जकत्वाज्ञानसद्भाव- त्वव्यङ्ग्याभाव स्थापनम् आलोकाभावानुपपत्तिवत्सुषुप्ते विज्ञानाभावानुपपत्तेः । न ह्यन्धकारे चक्षुषा रूपानुपलब्धौ चक्षुषोऽभावः शक्यः कल्पयितुं वैनाशिकेन ।
वैनाशिको ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावं कल्पयत्येवेति चेत् ।
येन तदभावं कल्पयेत्तस्याभावः वैनाशिकमत- केन कल्प्यत इति समीक्षा वक्तव्यं वैनाशिकेन, तदभावस्यापि ज्ञेयत्वाज्ज्ञानाभावे तदनुपपत्तेः ।
ज्ञानस्य ज्ञेयाव्यतिरिक्तत्वाज्ज्ञेयाभावे ज्ञानाभाव इति चेत् ।
न; अभावस्यापि ज्ञेयत्वाभ्युपगमादभावोऽपि ज्ञेयोऽभ्युपगम्यते वैनाशिकैर्नित्यश्च तदव्यतिरिक्तं चेज्ज्ञानं नित्यं कल्पितं स्यात्तदभावस्य च ज्ञानात्मकत्वादभावत्वं वाङ्मात्रमेव न परमार्थतोऽभावत्वमनित्यत्वं च ज्ञानस्य । न च नित्यस्य ज्ञानस्याभावनाममात्राध्यारोपे किञ्चिन्नश्छिन्नम् ।
अथाभावो ज्ञेयोऽपि सन् ज्ञानव्यतिरिक्त इति चेत् ।
न तर्हि ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावः ।
ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं न तु ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तमिति चेत् ।
न; शब्दमात्रत्वाद्विशेषानुपपत्तेः । ज्ञेयज्ञानयोरेकत्वं चेदभ्युपगम्यते ज्ञेयं ज्ञानव्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञेयव्यतिरिक्तं नेति तु शब्दमात्रमेतद्वह्निरग्निव्यतिरिक्तः, अग्निर्न वह्निव्यतिरिक्त इति यद्वदभ्युपगम्यते । ज्ञेयव्यतिरेके तु ज्ञानस्य ज्ञेयाभावे ज्ञानाभावानुपपत्तिः सिद्धा ।
ज्ञेयाभावेऽदर्शनादभावो ज्ञानस्येति चेत्?
न, सुषुप्ते ज्ञप्त्यभ्युपगमात् । वैनाशिकैरभ्युपगम्यते हि सुषुप्तेऽपि ज्ञानास्तित्वम् ।
तत्रापि ज्ञेयत्वमभ्युपगम्यते ज्ञानस्य स्वेनैवेति चेत् ।
न, भेदस्य सिद्धत्वात् । सिद्धं ह्यभावविज्ञेयविषयस्य ज्ञानस्य अभावज्ञेयव्यतिरेकाज्ज्ञेयज्ञानयोरन्यत्वम् । न हि तत्सिद्धं मृतमिवोज्जीवयितुं पुनरन्यथा कर्तुं शक्यते वैनाशिकशतैरपि ।
ज्ञानस्य ज्ञेयत्वमेवेति तदप्यन्येन तदप्यन्येनेति त्वत्पक्षेऽतिप्रसङ्ग इति चेत् ।
न, तद्विभागोपपत्तेः सर्वस्य । यदा हि सर्वं ज्ञेयं कस्यचित्तदा तद्व्यतिरिक्तं ज्ञानं ज्ञानमेवेति द्वितीयो विभाग एवाभ्युपगम्यतेऽवैनाशिकैर्न तृतीयस्तद्विषय इत्यनवस्थानुपपत्तिः ।
ज्ञानस्य स्वेनैवाविज्ञेयत्व सर्वज्ञत्वहानिरिति चेत् ।
सोऽपि दोषस्तस्यैवास्तु किं तन्निर्बर्हणेनास्माकम् । अनवस्थादोषश्च ज्ञानस्य ज्ञेयत्वाभ्युपगमात् । अवश्यं च वैनाशिकानां ज्ञानं ज्ञेयम् । स्वात्मना चाविज्ञेयत्वेनानवस्थानिवार्या ।
समान एवायं दोष इति चेत् ।
न, ज्ञानस्यैकत्वोपपत्तेः । ज्ञानावभासस्य औपाधिक- सर्वदेशकालमनेकत्वम् पुरुषाद्यवस्थमेकमेव ज्ञानं नामरूपाद्यनेकोपाधिभेदात् सवित्रादिजलादिप्रतिबिम्बवद् अनेकधावभासत इति । नासौ दोषः । तथा चेहेदमुच्यते ।
ननु श्रुतेरिहैवान्तःशरीरे परिच्छिन्नः कुण्डबदरवत्पुरुष इति ।
न, प्राणादिकलाकारणत्वात् । आत्मनः न हि शरीरमात्रअपरिच्छिन्नत्व- परिच्छिन्नस्य प्राणनिरूपणम् श्रद्धादीनां कलानां कारणत्वं प्रतिपत्तुं शक्नुयात् । कलाकार्यत्वाच्च शरीरस्य । न हि पुरुषकार्याणां कलानां कार्यं सच्छरीरं कारणकारणं स्वस्य पुरुषं कुण्डबदरमिवाभ्यन्तरीकुर्यात् ।
बीजवृक्षादिवत्स्यादिति चेत् । यथा बीजकार्यं वृक्षस्तत्कार्यं च फलं स्वकारणकारणं बीजमभ्यन्तरीकरोत्याम्रादि तद्वत् पुरुषमभ्यन्तरीकुर्याच्छरीरं स्वकारणकारणमपीति चेत् ।
न; अन्यत्वात्सावयवत्वाच्च । दृष्टान्ते कारणबीजाद् वृक्षफलसंवृत्तान्यन्यान्येव बीजानि दार्ष्टान्तिके तु स्वकारणकारणभूतः स एव पुरुषः शरीरेऽभ्यन्तरीकृतः श्रूयते । बीजवृक्षादीनां सावयवत्वाच्च स्यादाधाराधेयत्वं निरवयवश्च पुरुषः सावयवाश्च कलाः शरीरं च । एतेनाकाशस्यापि शरीराधारत्वमनुपपन्नं किमुताकाशकारणस्य पुरुषस्य तस्मादसमानो दृष्टान्तः ।
किं दृष्टान्तेन वचनात्स्यादिति चेत् ।
न; वचनस्याकारकत्वात् । न हि वचनं वस्तुनोऽन्यथाकरणे व्याप्रियते । किं तर्हि? यथाभूतार्थावद्योतने । तस्मादन्तःशरीर इत्येतद्वचनमण्डस्यान्तर्व्योमेतिवच्च द्रष्टव्यम् ।
उपलब्धिनिमित्तत्वाच्च, दर्शनश्रवणमननविज्ञानादिलिङ्गैरन्तःशरीरे परिच्छिन्न इव ह्युपलभ्यते पुरुष उपलभ्यते चात उच्यतेऽन्तःशरीरे सोम्य स पुरुष इति । न पुनराकाशकारणः सन्कुण्डबदरवच्छरीरपरिच्छिन्न इति मनसापीच्छति वक्तुं मूढोऽपि किमुत प्रमाणभूता श्रुतिः ॥ २ ॥