कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥
sa īkṣāṃcakre .
kasminnahamutkrānta utkrānto bhaviṣyāmi kasminvā pratiṣṭhite pratiṣṭhāsyāmīti .. 3 ..
उस सोलह कलाओंवाले पुरुष ने, जिसके विषय में भारद्वाज ने प्रश्न किया था, [प्राणादि की] उत्पत्ति, [उसके उत्क्रमण आदि] फल और [प्राण से श्रद्धा आदि] क्रम के विषय में ईक्षण—दर्शन यानी विचार किया । किस प्रकार विचार किया? सो बतलाते हैं—‘किस विशेष कर्ता के शरीर से उत्क्रमण करने पर मैं भी उत्क्रमण कर जाऊँगा तथा इसी प्रकार शरीर में किसके स्थित रहने पर मैं भी स्थित रहूँगा’ [—यह निश्चय करने के लिये उसने विचार किया]。
पूर्व०—[सांख्यमतानुसार] आत्मा अकर्ता है और प्रधान सब कुछ करनेवाला है । अतः पुरुष के लिये उसके [भोग और अपवर्गरूप] प्रयोजन को सामने रख प्रधान ही महदादिरूप से प्रवृत्त होता है । इस प्रकार सत्त्वादि गुणों के साम्यावस्थारूप एवं सृष्टिकर्ता प्रधान के प्रमाणतः सिद्ध होते हुए तथा [नैयायिक के मतानुसार] ईश्वर की इच्छा का अनुवर्तन करनेवाले परमाणुओं के रहते हुए एकमात्र होने के कारण आत्मा के कर्तृत्व में कोई साधन न होने से तथा उसका अपने ही लिये अनर्थकारित्व भी सिद्ध न हो सकने के कारण पुरुष का जो स्वतन्त्रता से ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व बतलाया गया है वह अयुक्त है; क्योंकि बुद्धिपूर्वक कर्म करनेवाला कोई भी चेतनायुक्त व्यक्ति अपना अनर्थ नहीं करेगा । अतः पुरुष के प्रयोजन से मानो ईक्षापूर्वक नियमित क्रम से प्रवृत्त हुए अचेतन प्रधान में चेतन की भाँति ‘उसने विचार किया’ इत्यादि प्रयोग औपचारिक है; जैसे राजा का सारा कार्य करनेवाले सेवक को भी ‘राजा’ कहा जाता है, उसीके समान इसे समझना चाहिये ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि आत्मा के भोक्तृत्व के समान उसका कर्तृत्व भी बन सकता है । जिस प्रकार सांख्यमत में चिन्मात्र और अपरिणामी आत्मा का भोक्तृत्व सम्भव है उसी प्रकार श्रुतिप्रमाण से वेदवादियों के मत में उसका ईक्षणपूर्वक कर्तृत्व भी बन सकता है ।
पूर्व०—आत्मा का तत्त्वान्तरपरिणाम ही उसके अनित्यत्व, अशुद्धत्व और अनेकत्व का कारण है, चिन्मात्रस्वरूप का विकार नहीं । अतः पुरुष का अपने में ही भोक्तृत्व रहने के कारण उसका चिन्मात्रस्वरूप विकार किसी प्रकार के दोष का कारण नहीं है । किन्तु आप वेदवादियों के मतानुसार सृष्टि का कर्तृत्व मानने में तो उसका तत्त्वान्तरपरिणाम ही मानना होगा और इससे आत्मा के अनित्यत्व आदि सब प्रकार के दोषों का प्रसंग उपस्थित हो जायगा ।
सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, क्योंकि हम अविद्याविषयक नामरूपमय उपाधि तथा उसके अभाव के कारण ही एकमात्र [निरुपाधिक] आत्मा की [औपाधिक] विशेषता मानते हैं । बन्ध-मोक्षादि शास्त्र के व्यवहार के लिये ही आत्मा का अविद्याकृत नाम-रूप-उपाधिमूलक विशेष माना गया है; परमार्थतः तो अनुपाधिकृत एक अद्वितीय तत्त्व ही मानना चाहिये, जो सम्पूर्ण तार्किकों की बुद्धि का अविषय, अभय और शिवस्वरूप है । उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व अथवा क्रिया-कारक या फल कुछ भी नहीं है, क्योंकि सभी भाव अद्वैतरूप हैं ।
परन्तु सांख्यवादी तो पुरुष में पहले अविद्यारोपित क्रिया, कारक, कर्तृत्व और फल की कल्पना कर फिर वेदबाह्य होने के कारण उससे घबड़ाकर पुरुष का वास्तविक भोक्तृत्व मान बैठे हैं । तथा प्रधान को पुरुष से भिन्न तत्त्वान्तरभूत परमार्थवस्तु मान लेने के कारण अन्य तार्किकों की बुद्धि के विषय होकर अपने सिद्धान्त से गिरा दिये जाते हैं ।
इसी प्रकार दूसरे तार्किक सांख्यवादियों से परास्त हो जाते हैं । इस प्रकार परस्पर विरुद्ध अर्थ की कल्पना कर मांसलोलुप प्राणियों के समान एकदूसरे के विरोधी अर्थ को ही देखनेवाले होने से परमार्थतत्त्व से दूर ही हटा दिये जाते हैं । अतः मुमुक्षुलोग उनके मत का अनादर कर वेदान्त के तात्पर्यार्थ एकत्वदर्शन के प्रति आदरयुक्त हों—इसलिये ही हम तार्किकों के मत का किंचित् दोष प्रदर्शित करते हैं, तार्किकों के समान कुछ तत्परता से नहीं । तथा इस विषय में ऐसा कहा गया है—
“[भेद सत्य है—] इस विरोध की उत्पत्ति के कारण को विवाद करनेवालों के ऊपर ही छोड़कर जिसने अपनी सद्बुद्धि को उनसे सुरक्षित रखा है वह वेदवेत्ता सुखपूर्वक शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।”
इसके सिवा, भोक्तृत्व और कर्तृत्व इन दोनों विकारों में कोई अन्तर मानना भी उचित नहीं है । कर्तृत्व से विजातीय यह भोक्तृत्व-विशिष्ट विकार है क्या?
जिससे कि पुरुष भोक्ता ही माना जाता है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं ।
पूर्व०—यह पहले ही कहा जा चुका है कि पुरुष चिन्मात्र ही है और वह भोग करते समय अपने स्वरूप में स्थित हुआ ही विकार को प्राप्त होता है—उसका विकार तत्त्वान्तरपरिणाम के द्वारा नहीं होता । किन्तु प्रधान तत्त्वान्तरपरिणाम के द्वारा विकृत होता है; अतः वह [महत्तत्त्वादि-भेद से] अनेक, अशुद्ध और अचेतन आदि धर्मों से युक्त है, तथा पुरुष उससे विपरीत स्वभाववाला है ।
सिद्धान्ती—यह कोई विशेषता नहीं है, क्योंकि यह तो केवल शब्दमात्र है । यदि भोगोत्पत्ति के पूर्व केवल चिन्मात्ररूप से स्थित पुरुष में भोग की उत्पत्ति के समय ही भोक्तृत्वरूप कोई विशेषता उत्पन्न होती है और भोग के निवृत्त होने पर उस विशेषता के दूर हो जाने पर वह फिर चिन्मात्र ही रह जाता है तो प्रधान भी महत् आदिरूप से परिणत होकर उनसे निवृत्त होने पर फिर प्रधानरूप से ही स्थित हो जाता है । अतः इस कल्पना में कोई विशेषता नहीं है; इसलिये तुम्हारे द्वारा प्रधान और पुरुष के विशिष्ट विकार की कल्पना केवल शब्दमात्र से ही की गयी है ।
पूर्व०—ठीक है, परन्तु भोगकाल में भी तो पुरुष पूर्ववत् चिन्मात्र ही है ।
सिद्धान्ती—तब तो परमार्थतः पुरुष का भोग ही सिद्ध नहीं होता ।
पूर्व०—परन्तु भोगकाल में जो चिन्मात्र पुरुष का विकार होता है वह वास्तविक ही होता है; इससे पुरुष का भोग सिद्ध होता है ।
सिद्धान्ती—नहीं, भोगकाल में तो प्रधान भी विकारयुक्त होता है, इससे उसके भी भोक्तृत्व का प्रसंग आ जायगा । यदि कहो कि भोक्तृत्व चिन्मात्र के ही विकार का नाम है तो उष्णता आदि असाधारण धर्मवाले अग्नि आदि के अभोक्तृत्व में भी कोई कारण नहीं दिखलायी देता [क्योंकि जिस प्रकार चेतनता पुरुष का असाधारण धर्म है उसी प्रकार उष्णता आदि उनके असाधारण धर्म हैं] ।
मध्यस्थ—यदि प्रधान और पुरुष दोनों का साथ-साथ भोक्तृत्व माना जाय तो?
सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इससे प्रधान का पारार्थ्य (अन्य के लिये होना) सिद्ध नहीं होगा । जिस प्रकार एक-दूसरे को प्रकाशित करने में दो प्रकाशों का गौण-मुख्य भाव नहीं बन सकता उसी प्रकार दो भोक्ताओं का भी परस्पर गौण-मुख्य भाव नहीं हो सकता ।
पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि ‘भोगधर्मवान् सत्त्वगुणप्रधान चित्त में जो चैतन्य के प्रतिबिम्ब का उदय होना है वही अविकारी पुरुष का भोक्तृत्व है’ तो?
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इससे तो पुरुष की कोई विशेषता न होने के कारण उसके भोक्तृत्व की कल्पना ही व्यर्थ सिद्ध होती है । यदि सर्वदा निर्विशेष होने के कारण पुरुष में भोगरूप अनर्थ है ही नहीं तो मोक्ष का साधनरूप शास्त्र किस [दोष]-की निवृत्ति के लिये रचा गया है? यदि कहो कि शास्त्ररचना तो अविद्या से आरोपित अनर्थ की निवृत्ति के लिये है तो ‘पुरुष परमार्थतः भोक्ता ही है, कर्ता नहीं तथा प्रधान कर्ता ही है, भोक्ता नहीं और वह परमार्थतः पुरुष से भिन्न कोई सद्वस्तु है’ ऐसी कल्पना शास्त्रबाह्य, व्यर्थ और निर्हेतुका है; यह मुमुक्षुओं से आदर की जानेयोग्य नहीं है ।
मध्यस्थ—परन्तु शास्त्ररचना आदि की व्यर्थता तो एकत्व मानने में भी है ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उस समय तो उन (शास्त्रादि)-का भी अभाव हो जाता है । शास्त्रप्रणेता आदि तथा उनके फलेच्छुकों के रहते हुए ही ‘शास्त्ररचना सार्थक है अथवा निरर्थक’ —ऐसा विकल्प हो सकता है ।
आत्मा का एकत्व सिद्ध होने पर तो शास्त्रप्रणेता आदि भी उस (आत्मतत्त्व) से भिन्न नहीं रहते; तथा उनका अभाव हो जाने पर तो इस प्रकार का विकल्प ही नहीं बन सकता ।
इसके सिवा आत्मैकत्व का निश्चय हो जाने पर जिस एकत्व का निश्चय करनेवाले तुमने उसके प्रतिपादक शास्त्र की अर्थवत्ता भी स्वीकार की है, उस (एकत्व) का निश्चय हो जाने पर भी शास्त्र “जहाँ इसे सब कुछ आत्मरूप ही हो जाता है वहाँ किसके द्वारा किसे देखे? ” इत्यादिरूप से विकल्प की असम्भावना ही बतलाता है । तथा परमार्थवस्तु के स्वरूप से अन्यत्र अविद्यासम्बन्धी विषयों में “जहाँ द्वैतसा होता है” आदि बृहदारण्यकश्रुति में शास्त्ररचना आदि की उपपत्ति भी विस्तार से बतलायी है ।
यहाँ [अथर्ववेदीय मुण्डकउपनिषद् में] तो शास्त्र के आरम्भ में ही परा और अपरारूप विद्या तथा अविद्या का विभाग किया है । अतः वेदान्तरूपी राजा की प्रमाणरूपिणी भुजाओं से सुरक्षित इस आत्मैकत्व-राज्य में तार्किकवादरूप योद्धाओं का प्रवेश नहीं हो सकता ।
इस प्रतिपादन से ब्रह्म का सृष्टि आदि के कर्तृत्व में साधनादि का अभावरूप दोष भी निरस्त हुआ समझना चाहिये, क्योंकि अविद्याकृत नाम-रूप आदि उपाधि के कारण ब्रह्म अनेक शक्ति और साधनजनित भेदों से युक्त है; तथा इसीसे हमारे विपक्षियों का बतलाया हुआ आत्मा का अपना ही अनर्थकर्तृत्वरूप दोष भी निवृत्त हो जाता है ।
और तुमने जो यह दृष्टान्त दिया कि राजा का सारा कार्य करनेवाले सेवक में ही ‘राजा कर्ता है’ ऐसा उपचार किया जाता है, सो यहाँ ठीक नहीं है, क्योंकि इससे “स ईक्षांचक्रे” इस प्रमाणभूता श्रुति का मुख्य अर्थ बाधित हो जाता है । जहाँ मुख्य अर्थ लेना सम्भव नहीं होता वहीं शब्द की गौणी कल्पना की जाती है । इस प्रसंग में तो मुक्त-बद्ध पुरुषविशेष की अपेक्षा से तथा कर्ता, कर्म, देश, काल और निमित्त की अपेक्षा से पुरुष के प्रति अचेतन प्रधान की नियत प्रवृत्ति सम्भव नहीं है, पूर्वोक्त सर्वज्ञ ईश्वर को कर्ता मानने के पक्ष में तो वह उचित ही है ॥ ३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स पुरुषः षोडशकलः पृष्टो यो भारद्वाजेन ईक्षांचक्र ईक्षणं दर्शनं चक्रे कृतवानित्यर्थः सृष्टिफलक्रमादिविषयम् । कथम्? इत्युच्यते कस्मिन्कर्तृविशेषे देहादुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि अहमेवं कस्मिन्वा शरीरे प्रतिष्ठिते अहं प्रतिष्ठास्यामि प्रतिष्ठितः स्यामित्यर्थः ।
नन्वात्माकर्ता प्रधानं कर्तृ, सृष्टौ अतः पुरुषार्थं सांख्यानां प्रयोजनमुररीकृत्य प्रधानकर्तृत्वम् प्रधानं प्रवर्तते महदाद्याकारेण । तत्रेदमनुपपन्नं पुरुषस्य स्वातन्त्र्येण ईक्षापूर्वकं कर्तृत्ववचनम्; सत्त्वादिगुणसाम्ये प्रधाने प्रमाणोपपन्ने सृष्टिकर्तरि सतीश्वरेच्छानुवर्तिषु वा परमाणुषु सत्स्वात्मनोऽप्येकत्वेन कर्तृत्वे साधनाभावादात्मन आत्मन्यनर्थकर्तृत्वानुपपत्तेश्च । न हि चेतनावान्बुद्धिपूर्वककार्यात्मनोऽनर्थं कुर्यात् । तस्मात्पुरुषार्थेन प्रयोजनेन ईक्षापूर्वकमिव नियतक्रमेण प्रवर्तमानेऽचेतने प्रधाने चेतनवदुपचारोऽयं ‘स ईक्षांचक्रे’ इत्यादिः । यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये राजेति तद्वत् ।
न; आत्मनो भोक्तृत्ववत्कर्तृसांख्यमत- त्वोपपत्तेः । यथा निरसनम् सांख्यस्य चिन्मात्रस्यापरिणामिनोऽप्यात्मनो भोक्तृत्वं तद्वद्वेदवादिनामीक्षादिपूर्वकं जगत्कर्तृत्वमुपपन्नं श्रुतिप्रामाण्यात् ।
तत्त्वान्तरपरिणाम आत्मनोऽनित्यत्वाशुद्धत्वानेकत्वनिमित्तो न चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया । अतः पुरुषस्य स्वात्मन्येव भोक्तृत्वे चिन्मात्रस्वरूपविक्रिया न दोषाय । भवतां पुनर्वेदवादिनां सृष्टिकर्तृत्वे तत्त्वान्तरपरिणाम एवेत्यात्मनोऽनित्यत्वादिसर्वदोषप्रसङ्ग इति चेत् ।
न; एकस्याप्यात्मनोऽविद्यायां आत्मनः विषयनामरूपोपाध्यकर्तृत्वादि- नुपाधिकृतविशेषाव्यवहारस्य भ्युपगमादविद्याकृतऔपाधिकत्वम् नामरूपोपाधिकृतो हि विशेषोऽभ्युपगम्यत आत्मनो बन्धमोक्षादिशास्त्रकृतसंव्यवहाराय परमार्थतोऽनुपाधिकृतं च तत्त्वमेकमेवाद्वितीयमुपादेयं सर्वतार्किकबुद्ध्यनवग्राह्यमभयं शिवम् इष्यते न तत्र कर्तृत्वं भोक्तृत्वं वा क्रियाकारकफलं च स्याद् अद्वैतत्वात्सर्वभावानाम् ।
सांख्यास्त्वविद्याध्यारोपितम् एव पुरुषे कर्तृत्वं क्रियाकारकं फलं चेति कल्पयित्वागमबाह्यत्वात्पुनस्ततस्त्रस्यन्तः परमार्थत एव भोक्तृत्वं पुरुषस्येच्छन्ति तत्त्वान्तरं च प्रधानं पुरुषात्परमार्थवस्तुभूतमेव कल्पयन्तोऽन्यतार्किककृतबुद्धिविषयाः सन्तो विहन्यन्ते ।
तथेतरे तार्किकाः सांख्यैः । इत्येवं परस्परविरुद्धार्थकल्पनात् आमिषार्थिन इव प्राणिनोऽन्योन्यविरुद्ध्यमानार्थदर्शित्वात् परमार्थतत्त्वाद्दूरम् एवापकृष्यन्ते । अतस्तन्मतमनादृत्य वेदान्तार्थतत्त्वमेकत्वदर्शनं प्रति आदरवन्तो मुमुक्षवः स्युरिति तार्किकमतदोषप्रदर्शनं किञ्चिदुच्यते अस्माभिर्न तु तार्किकवत्तात्पर्येण । तथैतदत्रोक्तम्—
“विवदत्स्वेव निक्षिप्य विरोधोद्भवकारणम् । तैः संरक्षितसद्बुद्धिः सुखं निर्वाति वेदवित् ॥ ” इति ।
किं च भोक्तृत्वकर्तृत्वयोर्विक्रिययोर्विशेषानुपपत्तिः । का नामासौ कर्तृत्वाज्जात्यन्तरभूता भोक्तृत्वविशिष्टा विक्रिया यतो भोक्तैव पुरुषः कल्प्यते न कर्ता प्रधानं तु कर्त्रैव न भोक्त्रिति ।
ननूक्तं पुरुषश्चिन्मात्र एव स सांख्यानां च स्वात्मस्थो कर्तृत्वभोक्तृत्व- विक्रियते भुञ्जानो न स्वरूपविवेचनम् तत्त्वान्तरपरिणामेन । प्रधानं तु तत्त्वान्तरपरिणामेन विक्रियतेऽतोऽनेकमशुद्धमचेतनं चेत्यादिधर्मवत्तद्विपरीतः पुरुषः ।
नासौ विशेषो वाङ्मात्रत्वात् । अस्य प्राग्भोगोत्पत्तेः केवलपरिहारः चिन्मात्रस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वं नाम विशेषो भोगोत्पत्तिकाले चेज्जायते निवृत्ते च भोगे पुनस्तद्विशेषादपेतश्चिन्मात्र एव भवतीति चेन्महदाद्याकारेण च परिणम्य प्रधानं ततोऽपेत्य पुनः प्रधानं स्वरूपेणावतिष्ठत इत्यस्यां कल्पनायां न कश्चिद्विशेष इति वाङ्मात्रेण प्रधानपुरुषयोर्विशिष्टविक्रिया कल्प्यते ।
अथ भोगकालेऽपि चिन्मात्र एव प्राग्वत्पुरुष इति चेत् ।
न तर्हि परमार्थतो भोगः पुरुषस्य ।
भोगकाले चिन्मात्रस्य विक्रिया परमार्थैव तेन भोगः पुरुषस्येति चेत् ।
न; प्रधानस्यापि भोगकाले विक्रियावत्त्वाद्भोक्तृत्वप्रसङ्गः । चिन्मात्रस्यैव विक्रिया भोक्तृत्वम् इति चेदौष्ण्याद्यसाधारणधर्मवतामग्न्यादीनामभोक्तृत्वेहेत्वनुपपत्तिः ।
प्रधानपुरुषयोर्द्वयोर्युगपद्भोक्तृत्वमिति चेत् ।
न; प्रधानस्य पारार्थ्यानुपपत्तेः । न हि भोक्त्रोर्द्वयोरितरेतरगुणप्रधानभाव उपपद्यते प्रकाशयोरिवेतरेतरप्रकाशने ।
भोगधर्मवति सत्त्वाङ्गिनि चेतसि पुरुषस्य चैतन्यप्रतिबिम्बोदयोऽविक्रियस्य पुरुषस्य भोक्तृत्वमिति चेत् ।
न; पुरुषस्य विशेषाभावे भोक्तृत्वकल्पनानर्थक्यात् । भोगरूपश्चेदनर्थः पुरुषस्य नास्ति सदा निर्विशेषत्वात्पुरुषस्य कस्य अपनयनार्थं मोक्षसाधनं शास्त्रं प्रणीयते । अविद्याध्यारोपितानर्थापनयनाय शास्त्रप्रणयनमिति चेत्परमार्थतः पुरुषो भोक्तैव न कर्ता प्रधानं कर्त्रैव न भोक्तृ परमार्थसद्वस्त्वन्तरं पुरुषाच्चेतीयं कल्पनागमबाह्या व्यर्था निर्हेतुका चेति नादर्तव्या मुमुक्षुभिः ।
एकत्वेऽपि शास्त्रप्रणयनाद्यानर्थक्यमिति चेत् ।
आत्मैक्यबोधे न, अभावात् । सत्सु शास्याभावात् हि शास्त्रप्रणेत्रादिषु शास्त्राभावः तत्फलार्थिषु च शास्त्रस्य प्रणयनमनर्थकं सार्थकं वेति विकल्पना स्यात् ।
न ह्यात्मैकत्वे शास्त्रप्रणेत्रादयस्ततो भिन्नाः सन्ति तदभाव एवं विकल्पनैवानुपपन्ना ।
अभ्युपगत आत्मैकत्वे प्रमाणार्थश्चाभ्युपगतो भवता यदात्मैकत्वमभ्युपगच्छता, तदभ्युपगमे च विकल्पानुपपत्तिमाह शास्त्रम् “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्” (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्यादि । शास्त्रप्रणयनाद्युपपत्तिं चाहान्यत्र परमार्थवस्तुस्वरूपादविद्याविषये । “यत्र हि द्वैतमिव भवति” (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्यादि विस्तरतो वाजसनेयके ।
अत्र च विभक्ते विद्याविद्ये परापरे इत्यादावेव शास्त्रस्य । अतो न तार्किकवादभटप्रवेशो वेदान्तराजप्रमाणबाहुगुप्तइहात्मैकत्वविषय इति ।
एतेनाविद्याकृतनामरूपाद्युपाधिकृतानेकशक्तिसाधनकृतभेदवत्त्वाद्ब्रह्मणः सृष्ट्यादिकर्तृत्वे साधनाद्यभावो दोषः प्रत्युक्तो वेदितव्यः परैरुक्त आत्मानर्थकर्तृत्वादिदोषश्च ।
यस्तु दृष्टान्तो राज्ञः सर्वार्थसृष्टेः कारिणि कर्तचेतनपूर्वकत्व- र्युपचाराद्राजा कर्तेति स्थापनम् सोऽत्रानुपपन्नः “स ईक्षांचक्रे” इति श्रुतेर्मुख्यार्थबाधनात्प्रमाणभूतायाः । तत्र हि गौणी कल्पना शब्दस्य यत्र मुख्यार्थो न सम्भवति । इह त्वचेतनस्य मुक्तबद्धपुरुषविशेषापेक्षया कर्तृकर्मदेशकालनिमित्तापेक्षया च बन्धमोक्षादिफलार्था नियता पुरुषं प्रति प्रवृत्तिर्नोपपद्यते । यथोक्तसर्वज्ञेश्वरकर्तृत्वपक्षे तूपपन्ना ॥ ३ ॥