प्रश्न 6 - मन्त्र 4

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥

sa prāṇamasṛjata prāṇācchraddhāṃ khaṃ vāyurjyotirāpaḥ pṛthivīndriyaṃ mano’nnamannādvīryaṃ tapo mantrāḥ karma lokā lokeṣu ca nāma ca .. 4 ..


उस पुरुष ने प्राण को रचा; फिर प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन और अन्न को तथा अन्न से वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म और लोकों को एवं लोकों में नाम को उत्पन्न किया ॥ ४ ॥

उस पुरुष ने उपर्युक्त प्रकार से ईक्षण कर हिरण्यगर्भसंज्ञक समष्टि प्राण को अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों की इन्द्रियों के आधारस्वरूप अन्तरात्मा को रचा । उस प्राण से समस्त प्राणियों की शुभ कर्मों में प्रवृत्ति की हेतुभूता श्रद्धा की रचना की । और उससे कर्मफलोपभोग के साधन [शरीर]- के अधिष्ठान अर्थात् कारणस्वरूप महाभूतों की सृष्टि की ।

सबसे पहले शब्दगुणविशिष्ट आकाश को रचा, फिर निजगुण स्पर्श और शब्दगुण से युक्त होने के कारण दो गुणवाले वायु को, तदनन्तर स्वकीय गुण रूप और पहले दो गुण शब्दस्पर्श से युक्त तीन गुणवाले तेज को तथा अपने असाधारण गुण रस के सहित पूर्वगुणों के अनुप्रवेश से चार गुणवाले जल को और गन्धगुण के सहित पूर्वगुणों के अनुप्रवेश से पाँच गुणोंवाली पृथिवी को रचा । इसी प्रकार विषयों के ज्ञान और कर्म के लिये उन भूतों से ही आरब्ध दस संख्यावाले दो प्रकार के इन्द्रियग्राम की तथा उसके स्वामी संकल्पविकल्पादिरूप अन्तःस्थित मन की रचना की ।

इस प्रकार प्राणियों के कार्य [विषय] और करणों [इन्द्रियों] की रचना कर उनकी स्थिति के लिये उसने व्रीहियवादिरूप अन्न उत्पन्न किया । फिर उस खाये हुए अन्न से सब प्रकार के कर्मों की प्रवृत्ति का साधनभूत वीर्य—सामर्थ्य यानी बल उत्पन्न किया । तदनन्तर वर्णसंकरता को प्राप्त होते हुए उन वीर्यवान् प्राणियों की शुद्धि के साधनभूत तप की रचना की । फिर जिनके बाह्य और अन्तःकरणों की तप से शुद्धि हो गयी है उन प्राणियों के लिये कर्म के साधनभूत ऋक्, यजुः, साम और अथर्वांगिरस मन्त्रों की रचना की और तत्पश्चात् अग्निहोत्रादि कर्म तथा कर्मों के फलस्वरूप लोकनिर्माण किये । फिर इस प्रकार रचे हुए उन लोकों में प्राणियों के देवदत्त, यज्ञदत्त आदि नाम बनाये ।

इस प्रकार तिमिररोगी की दृष्टि से रचे हुए द्विचन्द्र, मशक (मच्छर) और मक्षिका आदि तथा स्वप्नद्रष्टा के बनाये हुए सब पदार्थों के समान प्राणियों के अविद्या आदि दोषरूप बीज की अपेक्षा से रची हुई ये कलाएँ अपने नाम-रूप आदि विभाग को त्यागकर उस पुरुष में ही लीन हो जाती हैं ॥ ४ ॥

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स पुरुष उक्तप्रकारेणेक्षित्वा प्राणं हिरण्यगर्भाख्यं सर्वप्राणिकरणाधारमन्तरात्मानमसृजत सृष्टवान् ।

अतः प्राणाच्छ्रद्धां सर्वप्राणिनां शुभकर्मप्रवृत्तिहेतुभूताम् । ततः कर्मफलोपभोगसाधनाधिष्ठानानिकारणभूतानि महाभूतान्यसृजत ।

खं शब्दगुणम्, वायुं स्वेन स्पर्शेन कारणगुणेन च विशिष्टं द्विगुणम् । तथा ज्योतिः स्वेन रूपेण पूर्वाभ्यां च विशिष्टं त्रिगुणं शब्दस्पर्शाभ्याम् । तथापो रसेन गुणेनासाधारणेन पूर्वगुणानुप्रवेशेन च चतुर्गुणाः । तथा गन्धगुणेन पूर्वगुणानुप्रवेशेन च पञ्चगुणा पृथिवी । तथा तैरेव भूतैरारब्धमिन्द्रियं द्विप्रकारं बुद्ध्यर्थं कर्मार्थं च दशसंख्याकं तस्य चेश्वरमन्तःस्थं संशयसङ्कल्पलक्षणं मनः ।

एवं प्राणिनां कार्यं करणं च सृष्ट्वा तत्स्थित्यर्थं व्रीहियवादिलक्षणमन्नम् । ततश्चान्नादद्यमानाद्वीर्यं सामर्थ्यं बलं सर्वकर्मप्रवृत्तिसाधनम् । तद्वीर्यवतां च प्राणिनां तपो विशुद्धिसाधनं सङ्कीर्यमाणानाम् । मन्त्रास्तपो विशुद्धान्तर्बहिःकरणेभ्यः कर्मसाधनभूता ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसः ततः । कर्माग्निहोत्रादिलक्षणम् । ततो लोकाः कर्मणां फलम् । तेषु च सृष्टानां प्राणिनां नाम च देवदत्तो यज्ञदत्त इत्यादि ।

एवमेताः कलाः प्राणिनामविद्यादिदोषबीजापेक्षया सृष्टाः तैमिरिकदृष्टिसृष्टा इव द्विचन्द्रमशकमक्षिकाद्याः स्वप्नदृक्सृष्टा इव च सर्वपदार्थाः पुनस्तस्मिन्नेव पुरुषे प्रलीयन्ते हित्वा नामरूपादि विभागम् ॥ ४ ॥


नदीके दृष्टान्तसे सम्पूर्ण जगत्का पुरुषाश्रयत्वप्रतिपादन

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कथम्