प्रश्न 6 - मन्त्र 5

स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते ।
एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥

sa yathemā nadyaḥ syandamānāḥ samudrāyaṇāḥ samudraṃ prāpyāstaṃ gacchanti bhidyete tāsāṃ nāmarūpe samudra ityevaṃ procyate .
evamevāsya paridraṣṭurimāḥ ṣoḍaśa kalāḥ puruṣāyaṇāḥ puruṣaṃ prāpyāstaṃ gacchanti bhidyete cāsāṃ nāmarūpe puruṣa ityevaṃ procyate sa eṣo’kalo’mṛto bhavati tadeṣa ślokaḥ .. 5 ..


वह [दृष्टान्त] इस प्रकार है—जिस प्रकार समुद्र की ओर बहती हुई ये नदियाँ समुद्र में पहुँचकर अस्त हो जाती हैं, उनके नाम-रूप नष्ट हो जाते हैं, और वे ‘समुद्र’ ऐसा कहकर ही पुकारी जाती हैं । इसी प्रकार इस सर्वद्रष्टा की ये सोलह कलाएँ, जिनका अधिष्ठान पुरुष ही है, उस पुरुष को प्राप्त होकर लीन हो जाती हैं । उनके नाम-रूप नष्ट हो जाते हैं और वे ‘पुरुष’ ऐसा कहकर ही पुकारी जाती हैं । वह विद्वान् कलाहीन और अमर हो जाता है । इस सम्बन्ध में यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥ ५ ॥

वह दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार लोक में निरन्तर प्रवाहरूप से बहनेवाली तथा समुद्र ही जिनका अयन—गति अर्थात् आत्मभाव है ऐसी ये समुद्रायण नदियाँ समुद्र को प्राप्त होकर अस्त—अदर्शन अर्थात् नाम-रूप के तिरस्कार [अभाव]-को प्राप्त हो जाती हैं, तथा इस प्रकार अस्त हुई उन नदियों के वे गंगा-यमुना आदि नाम और रूप नष्ट हो जाते हैं और उससे अभेद हो जाने के कारण वह जलमय पदार्थ भी ‘समुद्र’ ऐसा कहकर ही पुकारा जाता है ।

इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उपर्युक्त लक्षणों से युक्त परिद्रष्टा अर्थात् जिस प्रकार सूर्य सब ओर अपने स्वरूपभूत प्रकाश का कर्ता है उसी प्रकार परि—सब ओर द्रष्टा—दर्शन के कर्ता स्वरूपभूत इस प्रकृत [जिसका प्रकरण चल रहा है] पुरुष की ये प्राण आदि उपर्युक्त सोलह कलाएँ, जिनका अयन—आत्मभाव की प्राप्ति का स्थान वह पुरुष ही है जैसा कि नदियों का समुद्र, अतः जो पुरुषायण कहलाती हैं, उस पुरुष को प्राप्त होकर—पुरुषरूप से स्थित होकर उसी प्रकार [जैसे कि समुद्र में नदियाँ] लीन हो जाती हैं । तथा इन कलाओं के प्राणादिसंज्ञक नाम और अपने-अपने विभिन्न रूप नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार नाम-रूप का नाश हो जानेपर भी जिसका नाश नहीं होता उस तत्त्व को ब्रह्मवेत्ता ‘पुरुष’ ऐसा कहकर पुकारते हैं ।

इस प्रकार जिसे गुरु ने कलाओं के प्रलय का मार्ग दिखलाया है ऐसा जो पुरुष इस तत्त्व को जाननेवाला है, वह उस विद्या के द्वारा अविद्या, काम और कर्मजनित प्राणादि कलाओं के लोप कर दिये जानेपर निष्कल हो जाता है और क्योंकि मृत्यु भी अविद्याकृत कलाओं के कारण ही, होती है इसलिये उनकी निवृत्ति हो जानेपर वह निष्कल हो जाने के कारण ही अमर हो जाता है । इसी सम्बन्ध में यह श्लोक प्रसिद्ध है— ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स दृष्टान्तो यथा लोक इमा नद्यः स्यन्दमानाः स्रवन्त्यः समुद्रायणाः समुद्रोऽयनं गतिः आत्मभावो यासां ताः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्योपगम्यास्तं नामरूपतिरस्कारं गच्छन्ति । तासां चास्तं गतानां भिद्येते विनश्यतो नामरूपे गङ्गायमुनेत्यादिलक्षणे तदभेदे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते तद्वस्तूदकलक्षणम् ।

एवं यथायं दृष्टान्तः, उक्तलक्षणस्य प्रकृतस्यास्य पुरुषस्य परिद्रष्टुः परि समन्ताद् द्रष्टुर्दर्शनस्य कर्तुः स्वरूपभूतस्य यथार्कः स्वात्मप्रकाशस्य कर्ता सर्वतः तद्वदिमाः षोडश कलाः प्राणाद्या उक्ताः कलाः पुरुषायणा नदीनामिव समुद्रः पुरुषोऽयनमात्मभावगमनं यासां कलानां ताः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्य पुरुषात्मभावमुपगम्य तथैवास्तं गच्छन्ति । भिद्येते चासां नामरूपे कलानां प्राणाद्याख्या रूपं च यथास्वम् ।

भेदे च नामरूपयोर्यदनष्टं तत्त्वं पुरुष इत्येवं प्रोच्यते ब्रह्मविद्भिः ।

य एवं विद्वान्गुरुणा प्रदर्शितकलाप्रलयमार्गः स एष विद्यया प्रविलापितास्वविद्याकामकर्मजनितासु प्राणादिकलास्वकलः, अविद्याकृतकलानिमित्तो हि मृत्युः तदपगमेऽकलत्वादेवामृतो भवति तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोकः ॥ ५ ॥