प्रश्न 6 - मन्त्र 6

अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥

arā iva rathanābhau kalā yasminpratiṣṭhitāḥ .
taṃ vedyaṃ puruṣaṃ veda yathā mā vo mṛtyuḥ parivyathā iti .. 6 ..


जिसमें रथ को नाभि में अरों के समान सब कलाएँ आश्रित हैं, उस ज्ञातव्य पुरुष को तुम जानो, जिससे कि मृत्यु तुम्हें कष्ट न पहुँचा सके ॥ ६ ॥
रथ के पहिये के परिवाररूप अरों के समान—अर्थात् जिस प्रकार वे रथ के पहिये की नाभि में प्रविष्ट यानी उसके आश्रित रहते हैं उसी प्रकार जिस पुरुष में प्राणादि कलाएँ अपनी उत्पत्ति, स्थिति और लय के समय स्थित रहती हैं, कलाओं के आत्मभूत उस ज्ञातव्य पुरुष को, जो सर्वत्र पूर्ण अथवा शरीररूप पुर में शयन करने के कारण पुरुष कहलाता है, जानो; जिससे कि हे शिष्यो! तुम्हें मृत्यु सब ओर से व्यथित न करे । यदि तुमने उस पुरुष को न जाना तो तुम मृत्युनिमित्तक व्यथा को प्राप्त होकर दुःखी ही होगे । अतः तुम्हें वह दुःख प्राप्त न हो, यही इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अरा रथचक्रपरिवारा इव रथनाभौ रथचक्रस्य नाभौ यथा प्रवेशितास्तदाश्रया भवन्ति यथा तथेत्यर्थः; कलाः प्राणाद्या यस्मिन्पुरुषे प्रतिष्ठिता उत्पत्तिस्थितिलयकालेषु तं पुरुषं कलानामात्मभूतं वेद्यं वेदनीयं पूर्णत्वात् पुरुषं पुरि शयनाद्वा वेद जानीयात्; यथा हे शिष्या मा वो युष्मान्मृत्युः परिव्यथा मा परिव्यथयतु । न चेद्विज्ञायेत पुरुषो मृत्युनिमित्तां व्यथामापन्ना दुःखिन एव यूयं स्थ । अतस्तन्मा भूद्युष्माकमित्यभिप्रायः ॥ ६ ॥