प्रश्न 6 - मन्त्र 7

तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद ।
नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥

tānhovācaitāvadevāhametatparaṃ brahma veda .
nātaḥ paramastīti .. 7 ..


तब उनसे उस (पिप्पलाद मुनि) ने कहा—इस परब्रह्म को मैं इतना ही जानता हूँ । इससे अन्य और कुछ [ज्ञातव्य] नहीं है ॥ ७ ॥
उन शिष्यों को इस प्रकार शिक्षा दे पिप्पलाद मुनि ने उनसे कहा—‘उस वेद्य (ज्ञातव्य) परब्रह्म को मैं इतना ही जानता हूँ । इससे पर—उत्कृष्टतर और कोई वेद्य नहीं है ।’ इस प्रकार ‘अभी कुछ बिना जाना रह गया’ ऐसी शिष्यों की आशङ्का की निवृत्ति के लिये तथा उनमें कृतार्थबुद्धि उत्पन्न करने के लिये पिप्पलाद ने उनसे कहा ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तानेवमनुशिष्य शिष्यांस्तान् होवाच पिप्पलादः किलैतावदेव वेद्यं परं ब्रह्म वेद विजानाम्यहमेतत् । नातोऽस्मात्परमस्ति प्रकृष्टतरं वेदितव्यमित्येवमुक्त्वा ञ्शिष्याणामविदितशेषास्तित्वाशङ्कानिवृत्तये कृतार्थबुद्धिजननार्थं च ॥ ७ ॥