ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥
te tamarcayantastvaṃ hi naḥ pitā yo’smākamavidyāyāḥ paraṃ pāraṃ tārayasīti namaḥ paramaṛṣibhyo namaḥ paramaṛṣibhyaḥ .. 8 ..
तब उन्होंने उनकी पूजा करते हुए कहा—आप तो हमारे पिता हैं, जिन्होंने कि हमें अविद्या के दूसरे पार पर पहुँचा दिया है; आप परमर्षि को हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो ॥ ८ ॥
तब गुरु से उपदेश पाये हुए उन शिष्यों ने कृतार्थ हो, उस विद्यादान का कोई अन्य प्रतिकार न देखकर क्या किया सो बतलाते हैं—उन्होंने गुरुजी का अर्चन अर्थात् चरणों में पुष्पाञ्जलि प्रदान एवं सिर झुकाकर प्रणाम करके उनका पूजन करते हुए [कहा] । क्या कहा, सो बतलाते हैं—‘विद्या के द्वारा हमारे नित्य, अजर, अमर एवं अभयरूप ब्रह्मशरीर के जनयिता होने के कारण आप तो हमारे पिता हैं; जिन आपने विद्यारूप नौका के द्वारा हमें विपरीत ज्ञानरूप अविद्या से अर्थात् जन्म, जरा, मरण, रोग और दुःख आदि ग्राहों के कारण जो अपार है उस अविद्यारूप समुद्र से उस ओर महासागर के पर पार के समान अपुनरावृत्तिरूप मोक्षसंज्ञक दूसरे पार पर पहुँचा दिया है; अतः आपका पितृत्व तो अन्य (जन्मदाता) पिता की अपेक्षा भी युक्ततर है; क्योंकि दूसरा पिता भी केवल शरीर को ही उत्पन्न करता है, तो भी वह लोक में सबसे अधिक पूजनीय होता है; फिर आत्यन्तिक अभयप्रदान करनेवाले आपके पूजनीयत्व के विषय में तो कहना ही क्या है? अतः ब्रह्मविद्या-सम्प्रदाय के प्रवर्तक परमर्षि को नमस्कार हो । यहाँ ‘नमः परमऋषिभ्यः’ इसकी द्विरुक्ति आदर-प्रदर्शन के लिये है ॥ ८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ततस्ते शिष्या गुरुणानुशिष्टास्तं गुरुं कृतार्थाः सन्तो विद्यानिष्क्रयमपश्यन्तः किं कृतवन्त इत्युच्यते—अर्चयन्तः पूजयन्तः पादयोः पुष्पाञ्जलिप्रकिरणेन प्रणिपातेन च शिरसा । किमूचुरित्याह—त्वं हि नोऽस्माकं पिता ब्रह्मशरीरस्य विद्यया जनयितृत्वान्नित्यस्याजरामरस्याभयस्य । यस्त्वमेव अस्माकमविद्याया विपरीतज्ञानाज्जन्मजरामरणरोगदुःखादिग्राहादपारादविद्यामहोदधेर्विद्याप्लवेन परमपुनरावृत्तिलक्षणं मोक्षाख्यं महोदधेरिव पारं तारयस्यस्मानित्यतः पितृत्वं तवास्मान् प्रत्युपपन्नमितरस्मात् । इतरोऽपि हि पिता शरीरमात्रं जनयति । तथापि स प्रपूज्यतमो लोके किमु वक्तव्यमात्यन्तिकाभयदातुरित्यभिप्रायः । नमः परमऋषिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृभ्यो नमः परमऋषिभ्य इति द्विर्वचनमादरार्थम् ॥ ८ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये षष्ठः प्रश्नः ॥ ६ ॥
इत्यथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥