शान्तिपाठ
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाग्ँसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
oṃ bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ .
sthirairaṅgaistuṣṭuvāg̐sastanūbhirvyaśema devahitaṃ yadāyuḥ ..
oṃ śāntiḥ! śāntiḥ!! śāntiḥ!!! svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ .
svasti nastārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatirdadhātu ..
oṃ śāntiḥ! śāntiḥ!! śāntiḥ!!!
हे देवगण! हम कानों से कल्याणमय वचन सुनें । यज्ञकर्म में समर्थ होकर नेत्रों से शुभ दर्शन करें । तथा स्थिर अंग और शरीरों से स्तुति करनेवाले हमलोग देवताओं के लिये हितकर आयु का भोग करें । त्रिविध ताप की शान्ति हो ।
महान् कीर्तिमान् इन्द्र हमारा कल्याण करें, परम ज्ञानवान् [अथवा परम धनवान्] पूषा हमारा कल्याण करें, जो अरिष्टों (आपत्तियों)-के लिये चक्र के समान [घातक] हैं वह गरुड हमारा कल्याण करें तथा बृहस्पतिजी हमारा कल्याण करें । त्रिविध ताप की शान्ति हो ।