तत्सद्ब्रह्मणे नमः
प्रथम प्रश्न
इतः पूर्णं ततः पूर्णं पूर्णात्पूर्णं परात्परम् ।
पूर्णानन्दं प्रपद्येऽहं सद्गुरुं शङ्करं स्वयम् ॥
पूर्णानन्दं प्रपद्येऽहं सद्गुरुं शङ्करं स्वयम् ॥
itaḥ pūrṇaṃ tataḥ pūrṇaṃ pūrṇātpūrṇaṃ parātparam .
pūrṇānandaṃ prapadye’haṃ sadguruṃ śaṅkaraṃ svayam ..
सम्बन्ध-भाष्य
अथर्वणमन्त्रोक्त [मुण्डकोपनिषद् के] अर्थ का विस्तारपूर्वक अनुवाद करनेवाली यह ब्राह्मणभागीय उपनिषद् अब आरम्भ की जाती है[ * ] । इसमें जो ऋषियों के प्रश्न और उत्तररूप आख्यायिका है वह विद्या की स्तुति के लिये है । यह विद्या आगे कहे प्रकार से एक वर्ष तक ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरुकुल में रहना तथा तप आदि साधनों से युक्त पुरुषों द्वारा ही ग्रहण की जानेयोग्य है तथा पिप्पलाद के समान सर्वज्ञतुल्य आचार्यों से ही कथन की जा सकती है, जिस किसी से नहीं—इस प्रकार विद्या की स्तुति की जाती है । तथा ब्रह्मचर्यादि साधनों की सूचना देने से उनकी कर्तव्यता भी प्राप्त होती है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
मन्त्रोक्तस्यार्थस्य विस्तारानुवादीदं ब्राह्मणमारभ्यते । ऋषिप्रश्नप्रतिवचनाख्यायिका तु विद्यास्तुतये । एवं संवत्सरब्रह्मचर्यसंवासादियुक्तैस्तपोयुक्तैर्ग्राह्या पिप्पलादादिवत्सर्वज्ञकल्पैराचार्यैर्वक्तव्या च, न सा येन केनचिदिति विद्यां स्तौति । ब्रह्मचर्यादिसाधनसूचनाच्च तत्कर्तव्यता स्यात् ।
सुकेशा आदि की गुरूपसत्ति
ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष
oṃ sukeśā ca bhāradvājaḥ śaibyaśca satyakāmaḥ sauryāyaṇī ca gārgyaḥ kausalyaścāśvalāyano bhārgavo vaidarbhiḥ kabandhī kātyāyanaste haite brahmaparā brahmaniṣṭhāḥ paraṃ brahmānveṣamāṇā eṣa
> [ * ]: दस उपनिषदों में प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य—ये तीन अथर्ववेदीय हैं । इनमें मुण्डक मन्त्रभाग की है तथा शेष दो ब्राह्मणभाग की हैं ।
ॐ