युक्ता आयुक्ताः ।
अलूक्षा धर्मकामाः स्युः ।
यथा ते तत्र वर्तेरन् ।
तथा तत्र वर्तेथाः ।
अथाभ्याख्यातेषु ।
ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः ।
युक्ता आयुक्ताः ।
अलूक्षा धर्मकामाः स्युः ।
यथा ते तेषु वर्तेरन् ।
तथा तेषु वर्तेथाः ।
एष आदेशः ।
एष उपदेशः ।
एषा वेदोपनिषत् ।
एतदनुशासनम् ।
एवमुपासितव्यम् ।
एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥
ye tatra brāhmaṇāḥ saṃmarśinaḥ .
yuktā āyuktāḥ .
alūkṣā dharmakāmāḥ syuḥ .
yathā te tatra varteran .
tathā tatra vartethāḥ .
athābhyākhyāteṣu .
ye tatra brāhmaṇāḥ saṃmarśinaḥ .
yuktā āyuktāḥ .
alūkṣā dharmakāmāḥ syuḥ .
yathā te teṣu varteran .
tathā teṣu vartethāḥ .
eṣa ādeśaḥ .
eṣa upadeśaḥ .
eṣā vedopaniṣat .
etadanuśāsanam .
evamupāsitavyam .
evamu caitadupāsyam .. 4 ..
वेद का अध्ययन कराने के अनन्तर आचार्य अन्तेवासी—शिष्य को उपदेश करता है; अर्थात् ग्रन्थ-ग्रहण के पश्चात् अनुशासन करता है—उसका अर्थ ग्रहण कराता है । इससे ज्ञात होता है कि वेदाध्ययन कर चुकने पर भी ब्रह्मचारी को बिना धर्मजिज्ञासा किये गुरुकुल से समावर्तन (अपने घर की ओर प्रत्यागमन) नहीं करना चाहिये । “कर्मों का यथावत् ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुष्ठान का आरम्भ करे” इस स्मृति से भी यही सिद्ध होता है । किस प्रकार उपदेश करता है? सो बतलाते हैं—
सत्य बोल अर्थात् जो कहनेयोग्य बात प्रमाण से जैसी जानी गयी हो उसे उसी प्रकार कह । इसी प्रकार धर्म का आचरण कर । ‘धर्म’ यह अनुष्ठान करनेयोग्य कर्मों का सामान्यरूप से वाचक है, क्योंकि सत्यादि विशेष धर्मों का तो निर्देश कर ही दिया है । स्वाध्याय अर्थात् अध्ययन से प्रमाद न कर । आचार्य के लिये प्रिय—उनका अभीष्ट धन लाकर और विद्यादान से उऋण होने के लिये उन्हें देकर आचार्य के आज्ञा देनेपर अपने अनुरूप स्त्री से विवाह करके प्रजातन्तु—सन्ततिक्रम का छेदन न कर । अर्थात् प्रजासन्तति का विच्छेद नहीं करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि यदि पुत्र उत्पन्न न हो तो भी पुत्र-काम्या (पुत्रेष्टि) आदि कर्मों द्वारा उसकी उत्पत्ति के लिये यत्न करना ही चाहिये । [नवम अनुवाक में] प्रजा, प्रजन और प्रजाति—तीनोंही का निर्देश किया गया है; उसकी सामर्थ्य से यही बात सिद्ध होती है; अन्यथा वहाँ केवल ‘प्रजन’ इस एक ही साधन का निर्देश किया जाता ।
सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिये । सत्य से प्रमाद का अभिप्राय है असत्य का प्रसंग, यह प्रमाद शब्द के सामर्थ्य से बोधित होता है । तात्पर्य यह है कि कभी भूलकर भी असत्यभाषण नहीं करना चाहिये; यदि ऐसा तात्पर्य न होता तो, यहाँ केवल असत्यभाषण का निषेध ही किया जाता । धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिये । ‘धर्म’ शब्द अनुष्ठेय कर्मविशेष का वाचक होने से उसका अनुष्ठान न करना ही प्रमाद है; सो नहीं करना चाहिये । अर्थात् धर्म का अनुष्ठान करना ही चाहिये । इसी प्रकार कुशल—
आत्मरक्षा में उपयोगी कर्मों से प्रमाद न करे । ‘भूति’ वैभव को कहते हैं, उस वैभव के लिये होनेवाले मंगलयुक्त कर्मों से प्रमाद न करे । स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद न करे । स्वाध्याय अध्ययन है और प्रवचन अध्यापन, उन दोनों से प्रमाद न करे अर्थात् उनका नियम से आचरण करता रहे ॥ १ ॥ इसी प्रकार देवकार्य और पितृकार्यों से भी प्रमाद न करे, अर्थात् देवता और पितृसम्बन्धी कर्म अवश्य करने चाहिये ।
मातृदेव—माता है देव जिसका वह तू मातृदेव हो । इसी प्रकार पितृदेव हो, आचार्यदेव हो, [अतिथिदेव हो] [इनका अर्थ समझना चाहिये] । तात्पर्य यह है कि ये सब देवता के समान उपासना करनेयोग्य हैं । इसके सिवा और भी जो अनवद्य—अनिन्द्य यानी शिष्टाचाररूप कर्म हैं तेरे लिये वे ही सेवनीय यानी कर्तव्य हैं । अन्य निन्दायुक्त कर्म—भले ही वे शिष्ट पुरुषों के किये हुए हों—तुझे नहीं करने चाहिये । हम आचार्यलोगों के भी जो सुचरित—शुभ चरित अर्थात् शास्त्र से अविरुद्ध कर्म हैं उन्हीं की तुझे उपासना करनी चाहिये; अदृष्ट फल के लिये उन्हीं का अनुष्ठान करना चाहिये अर्थात् तेरे लिये वे ही नियम से कर्तव्य हैं ॥ २ ॥ —दूसरे नहीं, अर्थात् उनसे विपरीत कर्म आचार्य के किये हुए भी कर्तव्य नहीं हैं ।
जो कोई भी आचार्यत्व आदि धर्मों के कारण विशिष्ट हैं, अर्थात् हमसे श्रेष्ठ—बड़े हैं तथा वे ब्राह्मण भी हैं—क्षत्रिय आदि नहीं हैं, उनका आसनादि के द्वारा अर्थात् उन्हें आसनादि देकर तुझे प्रश्वास—प्रश्वास का अर्थ है आश्वासन यानी श्रमापहरण करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि तुझे उनका श्रम निवृत्त करना चाहिये । तथा किसी गोष्ठी (सभा) के लिये उन्हें उच्चासन प्राप्त होनेपर तुझे प्रश्वास—दीर्घनिःश्वास भी नहीं छोड़ना चाहिये; तुझे केवल उनके कथन का सार ग्रहण करनेवाला होना चाहिये ।
इसके सिवा, तुझे जो कुछ दान करना हो वह श्रद्धा से ही देना चाहिये, अश्रद्धा से नहीं । श्री अर्थात् विभूति के अनुसार देना चाहिये, ह्री—लज्जापूर्वक देना चाहिये, भी—भय मानते हुए देना चाहिये तथा संविद् यानी मैत्री आदि कार्य के निमित्त से देना चाहिये ।
फिर इस प्रकार बर्तते हुए तुझे यदि किसी समय किसी श्रौत या स्मार्त कर्म अथवा आचरणरूप वृत्त (व्यवहार) में संशय उपस्थित हो ॥ ३ ॥ तो वहाँ उस देश या काल में जो ब्राह्मण नियुक्त हों—इस प्रकार ‘तत्र’ इस पद का ‘युक्ताः’ इस व्यवधानयुक्त पद से सम्बन्ध करना चाहिये—[और जो] संमर्शी—विचारक्षम, युक्त-कर्म अथवा आचरण में पूर्णतया तत्पर, आयुक्त—किसी दूसरे से प्रयुक्त न होनेवाले [अर्थात् स्वेच्छा से प्रवृत्त], अलूक्ष—अरूक्ष अर्थात् अक्रूरमति (सरलचित्त) और धर्मकामी—अदृष्टफल की इच्छावाले अर्थात् कामनावश विवेकशून्य न हों, वे ब्राह्मण उस कर्म या आचरण में जिस प्रकार बर्ताव करें उसी प्रकार तुझे भी बर्ताव करना चाहिये । इसी प्रकार अभ्याख्यातों के प्रति—अभ्याख्यात-अभ्युक्त अर्थात् जिनपर कोई संशययुक्त दोष आरोपित किया गया हो उनके प्रति जैसा पहले ‘ये तत्र’ इत्यादि से कहा गया है उसी सब व्यवहार का प्रयोग करना चाहिये ।
यह आदेश अर्थात् विधि है, यह पुत्रादि को पिता आदि का उपदेश है, यह वेदोपनिषद्—वेद का रहस्य यानी वेदार्थ है । यही अनुशासन यानी ईश्वर का वाक्य है । अथवा आदेशवाक्य विधि है—ऐसा पहले कहा जा चुका है इसलिये यह सभी प्रमाणभूत (उपदेशकों) का अनुशासन है । क्योंकि ऐसा है इसलिये पहले जो कुछ कहा गया है वह सब इसी प्रकार उपासनीय—करने योग्य है । इस प्रकार ही इसकी उपासना करनी चाहिये—यह उपासनीय ही है, अनुपास्य नहीं है—इस प्रकार यह पुनरुक्ति उपासना के आदर के लिये है ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेअधीतवेदस्य वासिनं शिष्यमनुकर्तव्यनिरूपणम् शास्ति ग्रन्थग्रहणादनु पश्चाच्छास्ति तदर्थं ग्राहयतीत्यर्थः । अतोऽवगम्यतेऽधीतवेदस्य धर्मजिज्ञासामकृत्वा गुरुकुलान्न समावर्तितव्यमिति । “बुद्ध्वा कर्माणि चारभेत्” इति स्मृतेश्च । कथमनुशास्तीत्याह—
सत्यं वद यथाप्रमाणावगतं वक्तव्यं तद्वद । तद्वद्धर्मं चर । धर्म इत्यनुष्ठेयानां सामान्यवचनं सत्यादिविशेषनिर्देशात् । स्वाध्यायादध्ययनान्मा प्रमदः प्रमादं मा कार्षीः । आचार्यायाचार्यार्थं प्रियमिष्टं धनमाहृत्यानीय दत्त्वा विद्यानिष्क्रयार्थम्, आचार्येण चानुज्ञातोऽनुरूपान्दारानाहृत्य प्रजातन्तुं प्रजासन्तानं मा व्यवच्छेत्सीः । प्रजासन्ततेर्विच्छित्तिर्न कर्तव्या । अनुत्पद्यमानेऽपि पुत्रे पुत्रकाम्यादिकर्मणा तदुत्पत्तौ यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः । प्रजाप्रजनप्रजातित्रयनिर्देशसामर्थ्यात् । अन्यथा प्रजनश्चेत्येतदेकमेवावक्ष्यत् ।
सत्यान्न प्रमदितव्यं प्रमादो न कर्तव्यः । सत्याच्च प्रमदनमनृतप्रसङ्गः, प्रमादशब्दसामर्थ्यात् । विस्मृत्याप्यनृतं न वक्तव्यमित्यर्थः । अन्यथासत्यवदनप्रतिषेध एव स्यात् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । धर्मशब्दस्यानुष्ठेयविषयत्वादननुष्ठानं प्रमादः स न कर्तव्यः । अनुष्ठातव्य एव धर्म इति यावत् । एवं कुशलादात्मरक्षार्थात्कर्मणो न प्रमदितव्यम् । भूतिर्विभूतिस्तस्यै भूत्यै भूत्यर्थान्मङ्गलयुक्तात्कर्मणो न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायोऽध्ययनं प्रवचनमध्यापनं ताभ्यां न प्रमदितव्यम् । ते हि नियमेन कर्तव्ये इत्यर्थः ॥ १ ॥ तथा देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । दैवपित्र्ये कर्मणी कर्तव्ये ।
मातृदेवो माता देवो यस्य स त्वं मातृदेवो भव स्याः । एवं पितृदेव आचार्यदेवो भव । देवतावदुपास्या एत इत्यर्थः । यान्यपि चान्यान्यनवद्यान्यनिन्दितानि शिष्टाचारलक्षणानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि कर्तव्यानि त्वया । नो न कर्तव्यानीतराणि सावद्यानि शिष्टकृतान्यपि । यान्यस्माकमाचार्याणां सुचरितानि शोभनचरितान्याम्नायाद्यविरुद्धानि तान्येव त्वयोपास्यान्यदृष्टार्थान्यनुष्ठेयानि, नियमेन कर्तव्यानीति यावत् ॥ २ ॥ नो इतराणि विपरीतान्याचार्यकृतान्यपि ।
ये के च विशेषिता आचार्यत्वादिधर्मैरस्मदस्मत्तः श्रेयांसः प्रशस्यतरास्ते च ब्राह्मणा न क्षत्रियादयस्तेषामासनेनासनदानादिना त्वया प्रश्वसितव्यम् । प्रश्वसनं प्रश्वासः श्रमापनयः । तेषां श्रमस्त्वयापनेतव्य इत्यर्थः । तेषां चासने गोष्ठीनिमित्ते समुदिते तेषु न प्रश्वसितव्यं प्रश्वासोऽपि न कर्तव्यः केवलं तदुक्तसारग्राहिणा भवितव्यम् ।
किं च यत्किंचिद्देयं तच्छ्रद्धयैव दातव्यम् । अश्रद्धया अदेयं न दातव्यम् । श्रिया विभूत्या देयं दातव्यम् । ह्रिया लज्जया च देयम् । भिया भीत्या च देयम् । संविदा च मैत्र्यादिकार्येण देयम् ।
अथैवं वर्तमानस्य यदि कदाचित्ते तव श्रौते स्मार्ते वा कर्मणि वृत्ते वाचारलक्षणे विचिकित्सा संशयः स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र तस्मिन् देशे काले वा ब्राह्मणास्तत्र कर्मादौ युक्ता इति व्यवहितेन सम्बन्धः कर्तव्यः । संमर्शिनो विचारक्षमाः । युक्ता अभियुक्ताः कर्मणि वृत्ते वा । आयुक्ता अपरप्रयुक्ताः । अलूक्षा अरूक्षा अक्रूरमतयः । धर्मकामा अदृष्टार्थिनोऽकामहता इत्येतत्, स्युर्भवेयुः । ते यथा येन प्रकारेण ब्राह्मणास्तत्र तस्मिन्कर्मणि वृत्ते वा वर्तेरंस्तथा त्वमपि वर्तेथाः ।
अथाभ्याख्यातेषु, अभ्याख्याता अभ्युक्ता दोषेण संदिह्यमानेन संयोजिताः केनचित्तेषु च यथोक्तं सर्वमुपनयेद्ये तत्रेत्यादि ।
एष आदेशो विधिः । एष उपदेशः पुत्रादिभ्यः पित्रादीनाम् । एषा वेदोपनिषद्वेदरहस्यं वेदार्थ इत्येतत् । एतदेवानुशासनमीश्वरवचनम् । आदेशवाक्यस्य विधेरुक्तत्वात्सर्वेषां वा प्रमाणभूतानामनुशासनमेतत् । यस्मादेवं तस्मादेवं यथोक्तं सर्वमुपासितव्यं कर्तव्यम् । एवमु चैतदुपास्यमुपास्यमेव चैतन्नानुपास्यमित्यादरार्थं पुनर्वचनम् ॥ ४ ॥
मोक्ष-साधनकी मीमांसा
अब विद्या और कर्म का विवेक [अर्थात् इन दोनों का फल भिन्न-भिन्न है—इसका निश्चय] करने के लिये यह विचार किया जाता है कि (१) क्या परम श्रेय की प्राप्ति केवल कर्म से होती है, (२) अथवा विद्या की अपेक्षायुक्त कर्म से, (३) किंवा परस्पर मिले हुए विद्या और कर्म दोनों से, (४) अथवा कर्म की अपेक्षा रखनेवाली विद्या से, (५) या केवल विद्या से ही?
उनमें [पहला पक्ष यह है कि] केवल कर्मों से ही परम श्रेय की प्राप्ति हो सकती है, क्योंकि “द्विजाति को रहस्य के सहित सम्पूर्ण वेद का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये” ऐसी स्मृति होने से सम्पूर्ण वेद का ज्ञान रखनेवाले को ही कर्म का अधिकार है और वेद का ज्ञान उपनिषद् के अर्थभूत आत्मज्ञानादि के सहित ही हो सकता है । “विद्वान् यज्ञ करता है” “विद्वान् यज्ञ कराता है” इत्यादि वाक्यों से सर्वत्र विद्वान् का ही कर्म में अधिकार दिखलाया गया है; तथा “जानकर कर्मानुष्ठान करे” ऐसा भी कहा है । कोई-कोई ऐसा भी मानते हैं कि सम्पूर्ण वेद कर्म के ही लिये हैं, और यदि कर्मों से ही परम श्रेय की प्राप्ति न हुई तो वेद भी व्यर्थ ही हो जायगा ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि मोक्ष का नित्यत्व है—मोक्ष नित्य ही माना गया है । और जो वस्तु कर्म का कार्य है उसकी अनित्यता लोक में प्रसिद्ध है । यदि नित्य श्रेय कर्मों से होता है ऐसा मानें तो इष्ट नहीं है; क्योंकि इसका “जिस प्रकार यह कर्मोपार्जित लोक क्षीण होता है [उसी प्रकार पुण्यार्जित परलोक भी क्षीण हो जाता है]” इस न्याययुक्ता श्रुति से विरोध है ।
पूर्व०—काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मों का आरम्भ न करने से, प्रारब्ध कर्मों का भोग से ही क्षय हो जाने से तथा नित्य कर्मों के अनुष्ठान के कारण प्रत्यवाय की उत्पत्ति न होने से मोक्ष ज्ञान की अपेक्षा से रहित ही है—यदि ऐसा माने तो?
सिद्धान्ती—ऐसी बात भी नहीं है; शेष (सञ्चित) कर्मों के रह जाने से उनके कारण अन्य शरीर की उत्पत्ति सिद्ध होती है—इस प्रकार हम इसका पहले ही खण्डन कर चुके हैं; तथा नित्यकर्मों के अनुष्ठान से सञ्चित कर्मों का विरोध न होने के कारण उनका क्षय होना सम्भव नहीं है ।
और यह जो कहा कि समस्त वेद के अर्थ को जाननेवाले को ही कर्म का अधिकार होने के कारण [केवल कर्म से ही निःश्रेयस की प्राप्ति हो सकती है] सो भी ठीक नहीं, क्योंकि उपासना श्रुतज्ञान (गुरुकुल में किये हुए वाक्यविचार)- से भिन्न ही है । मनुष्य श्रुतज्ञानमात्र से ही कर्म का अधिकारी हो जाता है, इसके लिये वह उपासना की अपेक्षा नहीं रखता । उपासना तो श्रुतज्ञान से भिन्न वस्तु ही बतलायी गयी है । वह उपासना मोक्षरूप फलवाली और अर्थान्तररूप से प्रसिद्ध है, क्योंकि ‘श्रोतव्यः’ ऐसा कहकर [मनन और निदिध्यासन के लिये] ‘मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’—इस प्रकार पृथक् यत्नान्तर का विधान किया है । लोक में भी श्रवणज्ञान से मनन और निदिध्यासन का अर्थान्तरत्व प्रसिद्ध ही है ।
पूर्व०—इस प्रकार तब तो विद्या की अपेक्षा से युक्त कर्मों द्वारा ही मोक्ष हो सकता है । जो कर्म ज्ञान के सहित होते हैं उनमें कार्यान्तर के आरम्भ का सामर्थ्य हो सकता है, जिस प्रकार कि स्वयं मरण और ज्वरादि कार्यों के आरम्भ में समर्थ होनेपर भी विष एवं दधि आदि में मन्त्र और शर्करादि से युक्त होनेपर कार्यान्तर के आरम्भ का सामर्थ्य हो जाता है, इसी प्रकार विद्यासहित कर्मों से मोक्ष का आरम्भ हो सकता है—यदि ऐसा माने तो?
सिद्धान्ती—नहीं, जो वस्तु आरम्भ होनेवाली होती है वह अनित्य हुआ करती है—इस प्रकार इस पक्ष का दोष बतलाया जा चुका है ।
पूर्व०—किन्तु [‘न स पुनरावर्तते’ इत्यादि] वचन से तो आरम्भ होनेवाला मोक्ष भी नित्य ही होता है?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वचन तो केवल ज्ञापक है; यथार्थ अर्थ को बतलानेवाले का ही नाम ‘वचन’ है । वह किसी अविद्यमान पदार्थ को उत्पन्न करनेवाला नहीं होता । सैकड़ों वचन होनेपर भी नित्य वस्तु का आरम्भ नहीं किया जा सकता और न आरम्भ होनेवाली वस्तु अविनाशी ही हो सकती है । इससे समुच्चित विद्या और कर्म के मोक्षारम्भकत्व का प्रतिषेध कर दिया गया ।
विद्या और कर्म ये दोनों मोक्ष के प्रतिबन्ध के हेतुओं को निवृत्त करनेवाले हैं [मोक्ष के स्वरूप को उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं; अतः जिस प्रकार प्रध्वंसाभाव कृतक होनेपर भी नित्य है उसी प्रकार उन प्रतिबन्धों की निवृत्ति भी नित्य ही होगी]—यदि ऐसा कहो तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि कर्मों का तो अन्य ही फल देखा गया है । उत्पत्ति, संस्कार, विकार और आप्ति—ये कर्म के फल देखे गये हैं । किन्तु मोक्ष उत्पत्ति आदि फल से विपरीत है ।
पूर्व०—गतिप्रतिपादिका श्रुतियों से तो मोक्ष आप्य सिद्ध होता है—“सूर्यद्वार से”, “उस सुषुम्ना नाडी द्वारा ऊर्ध्वलोकों को जानेवाला” आदि गतिप्रतिपादिका श्रुतियों से जाना जाता है कि मोक्ष प्राप्य है ।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ब्रह्म सर्वगत, गमन करनेवालों से अभिन्न और आकाशादि का भी कारण होने से सर्वगत है तथा सम्पूर्ण विज्ञानात्मा ब्रह्म से अभिन्न हैं; इसलिये मोक्ष आप्य नहीं है । गमन करनेवाले से पृथक् अन्य देश में ही गमन करने योग्य हुआ करता है । जो जिससे अभिन्न होता है उसीसे वह गन्तव्य नहीं होता और उसकी अनन्यता तो “उसे रचकर वह उसीमें प्रविष्ट हो गया” “सम्पूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी तू मुझको ही जान” इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियों से सिद्ध होती है ।
पूर्व०—[ऐसा मानने से तो] गति और ऐश्वर्य का प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियों से विरोध होगा—अच्छा, यदि मोक्ष अप्राप्य ही हो तो भी गतिश्रुति तथा “वह एकरूप होता है” “वह यदि पितृलोक की इच्छावाला होता है” “वह स्त्री और यानों के साथ रमण करता है” इत्यादि श्रुतियों का व्याकोप (बाध) हो जायगा ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वे तो कार्यब्रह्म से सम्बन्ध रखनेवाली हैं । स्त्री आदि तो कार्य ब्रह्म में ही हो सकती हैं, कारण ब्रह्म में नहीं; जैसा कि “एक ही अद्वितीय ब्रह्म” “जहाँ कोई और नहीं देखता” “तब किसके द्वारा किसे देखे” इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध होता है ।
इसके सिवा विद्या और कर्म का विरोध होने के कारण भी उनका समुच्चय नहीं हो सकता । जिसमें कर्ता-करण आदि कारकविशेषों का पूर्णतया लय होता है उस तत्त्व को (ब्रह्म को) विषय करनेवाली विद्या अपने से विपरीत साधनसाध्य कर्म से विरुद्ध है । एक ही वस्तु परमार्थतः कर्ता आदि विशेष से युक्त और उससे रहित—दोनों ही प्रकार से नहीं देखी जा सकती । उनमें से एक पक्ष अवश्य मिथ्या होना चाहिये । इस प्रकार किसी एक के मिथ्यात्व का प्रसङ्ग उपस्थित होने पर जो स्वभाव से ही अज्ञान का विषय है उस द्वैत का ही मिथ्या होना उचित है, जैसा कि “जहाँ द्वैत के समान होता है” “वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है” “जहाँ अन्य देखता है वह अल्प है” “यह अन्य है मैं अन्य हूँ” “जो थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे भय प्राप्त होता है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों से प्रमाणित होता है ।
तथा “एक रूप से ही देखना चाहिये” “एक ही अद्वितीय” “यह सब ब्रह्म ही है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियों से एकत्व की सत्यता सिद्ध होती है । सम्प्रदान आदि कारकभेद के दिखायी न देने पर कर्म होना सम्भव भी नहीं है । ज्ञान के प्रसङ्ग में भेददृष्टि के अपवाद तो सहस्रों सुनने में आते हैं । अतः विद्या और कर्म का विरोध है; इसलिये भी उनका समुच्चय होना असम्भव है । ऐसी दशा में पूर्व में तुमने जो कहा था कि ‘परस्पर मिले हुए विद्या और कर्म दोनों से मोक्ष होता है’ वह सिद्ध नहीं होता ।
पूर्व०—कर्म भी श्रुतिविहित हैं, अतः ऐसा मानने पर श्रुति से विरोध उपस्थित होता है । यदि सर्पादि-भ्रान्तिजनित ज्ञान का बाध करनेवाले रज्जु आदि विषयक ज्ञान के समान कर्ता आदि कारकविशेष का बाध करके ही आत्मैकत्व के ज्ञान का विधान किया जाता है तो कोई विषय न रहने के कारण कर्म का विधान करनेवाली श्रुतियों का उन (विद्या का विधान करनेवाली श्रुतियों)-से विरोध उपस्थित होता है; और कर्मों का विधान भी किया ही गया है तथा सभी श्रुतियाँ प्रमाणभूत हैं, इसलिये पूर्वोक्त विरोध का होना उचित नहीं है—यदि ऐसा कहें तो?
सिद्धान्ती—यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि श्रुतियाँ परम पुरुषार्थ का उपदेश करने में प्रवृत्त हैं । श्रुति ज्ञान का उपदेश करने में तत्पर है । उसे संसार से पुरुष का मोक्ष कराना है, इसके लिये संसार की हेतुभूत अविद्या की विद्या के द्वारा निवृत्ति करना आवश्यक है; अतः वह विद्या का प्रकाश करनेवाली होकर प्रवृत्त हुई है । इसलिये ऐसा मानने से कोई विरोध नहीं आता ।
पूर्व०—किन्तु ऐसा मानने पर भी तो कर्तादि कारक की सत्ता का प्रतिपादन करनेवाले शास्त्र का तो उससे विरोध होता ही है?
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; स्वभावतः प्राप्त कारकों के अस्तित्व को स्वीकार कर सञ्चित पापों के क्षय के लिये कर्मों का विधान करनेवाला शास्त्र मुमुक्षुओं और फल की इच्छावालों को [उनके इष्ट] फल की प्राप्ति कराने का साधन है; वह कारकों का अस्तित्व सिद्ध करने में प्रवृत्त नहीं है । जिस पुरुष का सञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध विद्यमान रहता है उसे ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती; उसका क्षय हो जाने पर ही ज्ञान होता है और तभी अविद्या की निवृत्ति होती है तथा उसके अनन्तर ही संसार की आत्यन्तिक उपरति होती है ।
इसके सिवा जो पुरुष अनात्मदर्शी है उसे ही अनात्मवस्तुसम्बन्धिनी कामना हो सकती है; कामनावाला ही कर्म करता है और उसीसे उनका फल भोगने के लिये उसे शरीरादिग्रहणरूप संसार की प्राप्ति होती है । इसके विपरीत जो आत्मैकत्वदर्शी है उसकी दृष्टि में विषयों का अभाव होने के कारण उसे उनकी कामना भी नहीं हो सकती । आत्मा तो अपने से अभिन्न है, इसलिये उसकी कामना भी असम्भव होने के कारण उसे स्वात्मस्वरूप में स्थित होनारूप मोक्ष सिद्ध ही है । इसलिये भी ज्ञान और कर्म का विरोध है और विरोध होने के कारण ही ज्ञान मोक्ष के प्रति कर्म की अपेक्षा नहीं रखता ।
हाँ, आत्मलाभ में पूर्वसञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध की निवृत्तिद्वारा नित्यकर्म ज्ञानप्राप्ति के हेतु अवश्य होते हैं । इसीलिये इस प्रकरण में कर्मों का उल्लेख किया गया है—यह हम पहले ही कह चुके हैं । इस प्रकार भी कर्म का विधान करनेवाली श्रुतियों का [विद्याविधायिनी श्रुतियों से] विरोध नहीं है । अतः यह सिद्ध हुआ कि केवल विद्या से ही परमश्रेय की प्राप्ति होती है ।
पूर्व०—यदि ऐसी बात है तब तो [गृहस्थाश्रम के सिवा] अन्य आश्रमों का होना भी उपपन्न नहीं है, क्योंकि विद्या की उत्पत्ति तो कर्म के निमित्त से होती है और कर्मों का विधान केवल गृहस्थ के ही लिये किया गया है; अतः इससे एकाश्रमत्व की ही सिद्धि होती है । और इसलिये ‘यावज्जीवन अग्निहोत्र करे’ इत्यादि श्रुतियाँ और भी अनुकूल ठहरती हैं ।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि कर्म तो अनेक हैं । केवल अग्निहोत्र आदि ही कर्म नहीं हैं । ब्रह्मचर्य, तप, सत्यभाषण, शम, दम और अहिंसा आदि अन्य कर्म भी इतर आश्रमों के लिये प्रसिद्ध ही हैं । वे तथा ध्यान-धारणादिरूप कर्म [हिंसा आदि दोषों से] असंकीर्ण होने के कारण ज्ञान की उत्पत्ति में सर्वोत्तम साधन हैं । आगे (भृगु० २ । ५ में) यह कहेंगे भी कि “तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर” ।
जन्मान्तर में किये हुए कर्मों से तो गृहस्थाश्रम स्वीकार करने से पूर्व भी ज्ञान की उत्पत्ति होना सम्भव है तथा गृहस्थाश्रम की स्वीकृति केवल कर्मों के ही लिये की जाती है । अतः कर्मसाध्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाने पर तो गृहस्थाश्रम की स्वीकृति भी व्यर्थ ही है ।
इसके सिवा पुत्रादि साधन तो लोकों की प्राप्ति के लिये हैं । पुत्रादि साधनों से सिद्ध होनेवाले उन इहलोक, पितृलोक एवं देवलोक आदि से जिसकी कामना निवृत्त हो गयी है, नित्यसिद्ध आत्मा का साक्षात्कार करनेवाले एवं कर्मों में कोई प्रयोजन न देखनेवाले उस ब्रह्मवेत्ता की कर्मों में कैसे प्रवृत्ति हो सकती है? जिसने गृहस्थाश्रम स्वीकार कर लिया है उसे भी, जब ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान के परिपाक से विषयों में वैराग्य होता है तो, कर्मों में अपना कोई प्रयोजन न देखकर उनसे निवृत्ति ही होगी । इस विषय में “अरी मैत्रेयि! अब मैं इस स्थान से संन्यास करना चाहता हूँ” इत्यादि श्रुतिरूप लिंग भी देखा जाता है ।
पूर्व०—किन्तु कर्म के प्रति श्रुति का अधिक प्रयत्न देखने से तो यह बात ठीक नहीं जान पड़ती? —अग्निहोत्रादि कर्म के प्रति श्रुति का विशेष प्रयत्न है; कर्मानुष्ठान में आयास भी अधिक है, क्योंकि अग्निहोत्रादि कर्म अनेक साधनों से सिद्ध होनेवाले हैं । अन्य आश्रमों के कर्म तप और ब्रह्मचर्यादि तो गृहस्थाश्रम में भी उन्हीं के समान कर्तव्य तथा अल्पसाधन की अपेक्षावाले हैं; अतः अन्य आश्रमियों के साथ गृहस्थाश्रम को समान-सा मानना तो उचित नहीं है?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उनपर जन्मान्तर का अनुग्रह होता है । तुमने जो कहा कि ‘कर्म पर श्रुति का विशेष प्रयत्न है’ इत्यादि, सो यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जन्मान्तर में किया हुआ भी अग्निहोत्रादि तथा ब्रह्मचर्यादिरूप कर्म ज्ञान की उत्पत्ति में उपयोगी होता है, जिससे कि कोई लोग तो जन्म से ही विरक्त देखे जाते हैं और कोई कर्म में तत्पर, वैराग्यशून्य एवं ज्ञान के विरोधी दीख पड़ते हैं । अतः जन्मान्तर के संस्कारों के कारण जो विरक्त हैं उन्हें तो [गृहस्थाश्रम से भिन्न] अन्य आश्रमों को स्वीकार करना ही इष्ट होता है ।
कर्मफलों की अधिकता होने के कारण भी [श्रुति में उनका विशेष विस्तार है] । पुत्र, स्वर्ग एवं ब्रह्मतेज आदि कर्मफल असंख्येय होने के कारण और उनके लिये पुरुषों की कामनाओं की अधिकता होने से भी कर्मों के प्रति श्रुति का अधिक यत्न होना उचित ही है, क्योंकि ‘मुझे यह मिले, मुझे यह मिले’ इस प्रकार कामनाओं की बहुलता भी देखी ही जाती है ।
उपायरूप होने के कारण भी [श्रुति का उनमें विशेष प्रयत्न है] । कर्म ज्ञानोत्पत्ति में उपायरूप हैं—ऐसा हम पहले कह चुके हैं; तथा प्रयत्न उपाय में ही अधिक करना चाहिये, उपेय में नहीं ।
पूर्व०—ज्ञान कर्म के निमित्त से होनेवाला है, इसलिये भी अन्य प्रयत्न की निरर्थकता सिद्ध होती है । यदि कर्मों के द्वारा ही पूर्वसञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध का क्षय होने पर ज्ञान की उत्पत्ति होती है तो कर्मों से भिन्न उपनिषच्छ्रवणादिविषयक प्रयत्न व्यर्थ ही है । ऐसा मानें तो?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है—‘ज्ञान की उत्पत्ति प्रतिबन्ध के क्षय से ही होती है, ईश्वरकृपा, तप एवं ध्यानादि के अनुष्ठान से नहीं हो सकती’ ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि अहिंसा एवं ब्रह्मचर्यादि भी ज्ञानोत्पत्ति में उपयोगी हैं तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि तो उसके साक्षात् कारण ही हैं । अतः अन्य आश्रमों का होना सिद्ध ही है, तथा ज्ञान में सभी आश्रमियों का अधिकार है । इससे यह सिद्ध हुआ कि परमश्रेय की प्राप्ति केवल ज्ञान से ही हो सकती है ।
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अत्रैतच्चिन्त्यते विद्याकर्मणोविवेकार्थं किं कर्ममोक्षकारणमीमांसायां भ्य एव केवलेभ्यः चत्वारो विकल्पाः परं श्रेय उत विद्यासव्यपेक्षेभ्य आहोस्विद्विद्याकर्मभ्यां संहताभ्यां विद्याया वा कर्मापेक्षाया उत केवलाया एव विद्याया इति?
तत्र केवलेभ्य एव कर्मभ्यः कर्मणां मोक्ष- स्यात् । समस्तसाधनत्वनिरासः वेदार्थज्ञानवतः कर्माधिकारात् । “वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना” इति स्मरणात् । अधिगमश्च सहोपनिषदर्थेनात्मज्ञानादिना । “विद्वान्यजते” “विद्वान्याजयति” इति च विदुष एव कर्मण्यधिकारः प्रदर्श्यते सर्वत्र “ज्ञात्वा चानुष्ठानम्” इति च । कृत्स्नश्च वेदः कर्मार्थ इति हि मन्यन्ते केचित् । कर्मभ्यश्चेत्परं श्रेयो नावाप्यते वेदोऽनर्थकः स्यात् ।
न; नित्यत्वान्मोक्षस्य, नित्यो हि मोक्ष इष्यते । कर्मकार्यस्यानित्यत्वं प्रसिद्धं लोके । कर्मभ्यश्चेच्छ्रेयो नित्यं स्यात्तच्चानिष्टम् । “तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते” (छा० उ० ८ । १ । ६) इति न्यायानुगृहीतश्रुतिविरोधात् ।
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भादारब्धस्य च कर्मण उपभोगेन क्षयान्नित्यानुष्ठानाच्च तत्प्रत्यवायानुत्पत्तेर्ज्ञाननिरपेक्ष एव मोक्ष इति चेत्?
तच्च न; शेषकर्मसम्भवात्तन्निमित्तशरीरान्तरोत्पत्तिः प्राप्नोतीति प्रत्युक्तम् । कर्मशेषस्य च नित्यानुष्ठानेनाविरोधात्क्षयानुपपत्तिरिति च ।
यदुक्तं समस्तवेदार्थज्ञानवतः कर्माधिकारादित्यादि, तच्च न; श्रुतज्ञानव्यतिरेकादुपासनस्य । श्रुतज्ञानमात्रेण हि कर्मण्यधिक्रियते नोपासनामपेक्षते । उपासनं च श्रुतज्ञानादर्थान्तरं विधीयते । मोक्षफलमर्थान्तरप्रसिद्धं च स्यात् । ‘श्रोतव्यः’ इत्युक्त्वा तद्व्यतिरेकेण ‘मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ इति यत्नान्तरविधानात् । मनननिदिध्यासनयोश्च प्रसिद्धं श्रवणज्ञानादर्थान्तरत्वम् ।
एवं तर्हि विद्यासव्यपेक्षेभ्यः ज्ञानकर्मसमुच्चयकर्मभ्यः स्यान्मोक्षः । स्य मोक्षविद्यासहितानां च साधनत्वनिरासः कर्मणां भवेत्कार्यान्तरारम्भसामर्थ्यम् । यथा स्वतो मरणज्वरादिकार्यारम्भसमर्थानामपि विषदध्यादीनां मन्त्रशर्करादिसंयुक्तानां कार्यान्तरारम्भसामर्थ्यम्, एवं विद्यासहितैः कर्मभिर्मोक्ष आरभ्यत इति चेत्?
न; आरभ्यस्यानित्यत्वादित्युक्तो दोषः ।
वचनादारभ्योऽपि नित्य एवेति चेत्?
न; ज्ञापकत्वाद्वचनस्य । वचनं नाम यथाभूतस्यार्थस्य ज्ञापकं नाविद्यमानस्य कर्तृ । न हि वचनशतेनापि नित्यमारभ्यत आरब्धं वाविनाशि भवेत् । एतेन विद्याकर्मणोः संहतयोर्मोक्षारम्भकत्वं प्रत्युक्तम् ।
विद्याकर्मणी मोक्षप्रतिबन्धहेतुनिवर्तके इति चेत्—न, कर्मणः फलान्तरदर्शनात् । उत्पत्तिसंस्कारविकाराप्तयो हि फलं कर्मणो दृश्यते । उत्पत्त्यादिफलविपरीतश्च मोक्षः ।
गतिश्रुतेराप्य इति चेत् । “सूर्यद्वारेण”, “तयोर्ध्वमायन्” (क० उ० २ । ३ । १६) इत्येवमादिगतिश्रुतिभ्यः प्राप्यो मोक्ष इति चेत् ।
न; सर्वगतत्वाद्गन्तृभिश्चानन्यत्वादाकाशादिकारणत्वात्सर्वगतं ब्रह्म । ब्रह्माव्यतिरिक्ताश्च सर्वे विज्ञानात्मानः । अतो नाप्यो मोक्षः । गन्तुरन्यद्धिभिन्नं देशं प्रति भवति गन्तव्यम् । न हि येनैवाव्यतिरिक्तं यत्तत्तेनैव गम्यते । तदनन्यत्वसिद्धेश्च “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २ । ६ । १) “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” (गीता १३ । २) इत्येवमादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्यः ।
गत्यैश्वर्यादिश्रुतिविरोध इति चेत् । अथापि स्याद्यद्यप्राप्यो मोक्षस्तदा गतिश्रुतीनां “स एकधा” (छा० उ० ७ । २६ । २) “स यदि पितृलोककामो भवति” (छा० उ० ८ । २ । १) “स्त्रीभिर्वा यानैर्वा” (छा० उ० ८ । १२ । ३) इत्यादिश्रुतीनां च कोपः स्यादिति चेत् ।
न; कार्यब्रह्मविषयत्वात्तासाम् । कार्ये हि ब्रह्मणि स्त्र्यादयः स्युर्न कारणे । “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । १) “यत्र नान्यत्पश्यति” (छा० उ० ७ । २४ । १) “तत्केन कं पश्येत्” (बृ० उ० २ । ४ । १४, ४ । ५ । १५) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
विरोधाच्च विद्याकर्मणोः समुच्चयानुपपत्तिः । प्रविलीनकर्त्रादिकारकविशेषतत्त्वविषया हि विद्या तद्विपरीतकारकसाध्येन कर्मणा विरुध्यते । न ह्येकं वस्तु परमार्थतः कर्त्रादिविशेषवत्तच्छून्यं चेत्युभयथा द्रष्टुं शक्यते । अवश्यं ह्यन्यतरन्मिथ्या स्यात् । अन्यतरस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गे युक्तं यत्स्वाभाविकाज्ञानविषयस्य द्वैतस्य मिथ्यात्वम् । “यत्र हि द्वैतमिव भवति” (बृ० उ० २ । ४ । १४) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति” (क० उ० २ । १ । १०, बृ० उ० ४ । ४ । १९) “अथ यत्रान्यत्पश्यति············तदल्पम्” (छा० उ० ७ । २४ । १) “अन्योऽसावन्योऽहमस्मि” (बृ० उ० १ । ४ । १०) “उदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति” (तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः ।
सत्यत्वं चैकत्वस्य “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४ । ४ । २०) “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । १) “ब्रह्मैवेदग्ँ सर्वम् (मु० उ० २ । २ । ११) “आत्मैवेदग्ँ सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च सम्प्रदानादिकारकभेदादर्शने कर्मोपपद्यते । अन्यत्वदर्शनापवादश्च विद्याविषये सहस्रशः श्रूयते । अतो विरोधो विद्याकर्मणोः । अतश्च समुच्चयानुपपत्तिः । तत्र यदुक्तं संहताभ्यां विद्याकर्मभ्यां मोक्ष इति, अनुपपन्नं तत् ।
विहितत्वात्कर्मणां श्रुतिविरोध इति चेत् । यद्युपमृद्य कर्त्रादिकारकविशेषमात्मैकत्वविज्ञानं विधीयते सर्पादिभ्रान्तिविज्ञानोपमर्द्दकरज्ज्वादिविषयविज्ञानवत्प्राप्तः कर्मविधिश्रुतीनां निर्विषयत्वाद्विरोधः । विहितानि च कर्माणि । स च विरोधो न युक्तः । प्रमाणत्वाच्छ्रुतीनामिति चेत्?
न; पुरुषार्थोपदेशपरत्वाच्छ्रुतीनाम् । विद्योपदेशपरा तावच्छ्रुतिः संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति संसारहेतोरविद्याया विद्यया निवृत्तिः कर्तव्येति विद्याप्रकाशकत्वेन प्रवृत्तेति न विरोधः ।
एवमपि कर्त्रादिकारकसद्भावप्रतिपादनपरं शास्त्रं विरुध्यत एवेति चेत्?
न; यथाप्राप्तमेव कारकास्तित्वमुपादायोपात्तदुरितक्षयार्थं कर्माणि विदधच्छास्त्रं मुमुक्षूणां फलार्थिनां च फलसाधनं न कारकास्तित्वे व्याप्रियते । उपचितदुरितप्रतिबन्धस्य हि विद्योत्पत्तिर्नावकल्प्यते । तत्क्षये च विद्योत्पत्तिः स्यात्ततश्चाविद्यानिवृत्तिस्तत आत्यन्तिकः संसारोपरमः ।
अपि चानात्मदर्शिनो ह्यनात्मज्ञानादेव तु विषयः कामः । कैवल्यम् कामयमानश्च करोति कर्माणि । ततस्तत्फलोपभोगाय शरीराद्युपादानलक्षणः संसारः । तद्व्यतिरेकेणात्मैकत्वदर्शिनो विषयाभावात्कामानुत्पत्तिरात्मनि चानन्यत्वात्कामानुत्पत्तौ स्वात्मन्यवस्थानं मोक्ष इत्यतोऽपि विद्याकर्मणोर्विरोधः । विरोधादेव च विद्या मोक्षं प्रति न कर्माण्यपेक्षते ।
स्वात्मलाभे तु पूर्वोपचितप्रतिबन्धापनयद्वारेण विद्याहेतुत्वं प्रतिपद्यन्ते कर्माणि नित्यानीति । अत एवास्मिन्प्रकरण उपन्यस्तानि कर्माणीत्यवोचाम । एवं चाविरोधः कर्मविधिश्रुतीनाम् अतः केवलाया एव विद्यायाः परं श्रेय इति सिद्धम् ।
एवं तर्ह्याश्रमान्तरानुपपत्तिः । कर्मनिमित्तत्वाद्विद्योत्पत्तेः । गार्हस्थ्ये च विहितानि कर्माणीत्येकाश्रम्यमेव । अतश्च यावज्जीवादिश्रुतयोऽनुकूलतराः ।
न; कर्मानेकत्वात् । न ज्ञानसाधकानि ह्यग्निहोत्रादीन्येव कर्माणि कर्माणि । ब्रह्मचर्यं तपः सत्यवदनं शमो दमोऽहिंसेत्येवमादीन्यपि कर्माणीतराश्रमप्रसिद्धानि विद्योत्पत्तौ साधकतमान्यसंकीर्णत्वाद्विद्यन्ते ध्यानधारणादिलक्षणानि च । वक्ष्यति च—“तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” (तै० उ० ३ । २—५) इति ।
जन्मान्तरकृतकर्मभ्यश्च प्रागपिज्ञानप्राप्तौ गार्हस्थ्याद्विद्योत्पत्तिगार्हस्थ्यस्य सम्भवात्कर्मार्थानर्थक्यम् त्वाच्च गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेः कर्मसाध्यायां च विद्यायां सत्यां गार्हस्थ्यप्रतिपत्तिरनर्थकैव ।
लोकार्थत्वाच्च पुत्रादीनाम्; पुत्रादिसाध्येभ्यश्चायं लोकः पितृलोको देवलोक इत्येतेभ्यो व्यावृत्तकामस्य नित्यसिद्धात्मलोकदर्शिनः कर्मणि प्रयोजनमपश्यतः कथं प्रवृत्तिरुपपद्यते । प्रतिपन्नगार्हस्थ्यस्यापि विद्योत्पत्तौ विद्यापरिपाकाद्विरक्तस्य कर्मसु प्रयोजनमपश्यतः कर्मभ्यो निवृत्तिरेव स्यात् । “प्रव्रजिष्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि” (बृ० उ० ४ । ५ । २) इत्येवमादिश्रुतिलिङ्गदर्शनात् ।
कर्म प्रति श्रुतेर्यत्नाधिक्यदर्शनादयुक्तमिति चेदग्निहोत्रादिकर्म प्रति श्रुतेरधिको यत्नो महांश्च कर्मण्यायासोऽनेकसाधनसाध्यत्वादग्निहोत्रादीनाम् । तपोब्रह्मचर्यादीनां चेतराश्रमकर्मणां गार्हस्थ्येऽपि समानत्वा- दल्पसाधनापेक्षत्वाच्चेतरेषां न युक्तस्तुल्यवद्विकल्प आश्रमिभिस्तस्येति चेत् ।
न; जन्मान्तरकृतानुग्रहात् । यदुक्तं कर्मणि श्रुतेरधिको यत्न इत्यादि नासौ दोषः । यतो जन्मान्तरकृतमप्यग्निहोत्रादिलक्षणं कर्म ब्रह्मचर्यादिलक्षणं चानुग्राहकं भवति विद्योत्पत्तिं प्रति । येन जन्मनैव विरक्ता दृश्यन्ते केचित् । केचित्तु कर्मसु प्रवृत्ता अविरक्ता विद्याविद्वेषिणः । तस्माज्जन्मान्तरकृतसंस्कारेभ्यो विरक्तानामाश्रमान्तरप्रतिपत्तिरेवेष्यते ।
कर्मफलबाहुल्याच्च; पुत्रस्वर्गकर्मविधौ श्रुतेः ब्रह्मवर्चसादिप्रयासप्रयोजनम् लक्षणस्य कर्मफलस्यासंख्येयत्वात्, तत्प्रति च पुरुषाणां कामबाहुल्यात्तदर्थः श्रुतेरधिको यत्नः कर्मसूपपद्यते । आशिषां बाहुल्यदर्शनादिदं मे स्यादिदं मे स्यादिति ।
उपायत्वाच्च; उपायभूतानि हि कर्माणि विद्यां प्रतीत्यवोचाम । उपायेऽधिको यत्नः कर्तव्यो नोपेये ।
कर्मनिमित्तत्वाद्विद्याया यत्नान्तरानर्थक्यमिति चेत्कर्मभ्य एव पूर्वोपचितदुरितप्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते चेत्कर्मभ्यः पृथगुपनिषच्छ्रवणादियत्नोऽनर्थक इति चेत् ।
न; नियमाभावात् । न हि प्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते न त्वीश्वरप्रसादतपोध्यानाद्यनुष्ठानादिति नियमोऽस्ति । अहिंसाब्रह्मचर्यादीनां च विद्यां प्रत्युपकारकत्वात्साक्षादेव च कारणत्वाच्छ्रवणमनननिदिध्यासनानाम् । अतः सिद्धान्याश्रमान्तराणि सर्वेषां चाधिकारो विद्यायां परं च श्रेयः केवलाया विद्याया एवेति सिद्धम् ।
इति शीक्षावल्ल्यामेकादशोऽनुवाकः ॥ ११ ॥