अधरा हनुः पूर्वरूपम् ।
उत्तरा हनुरुत्तररूपम् ।
वाक्संधिः ।
जिह्वा संधानम् ।
इत्यध्यात्मम् ।
इतीमा महासग्ँहिताः य एवमेता महासग्ँहिता व्याख्याता वेद ।
संधीयते प्रजया पशुभिः ।
ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४ ॥
athādhyātmam .
adharā hanuḥ pūrvarūpam .
uttarā hanuruttararūpam .
vāksaṃdhiḥ .
jihvā saṃdhānam .
ityadhyātmam .
itīmā mahāsag̐hitāḥ ya evametā mahāsag̐hitā vyākhyātā veda .
saṃdhīyate prajayā paśubhiḥ .
brahmavarcasenānnādyena suvargeṇa lokena .. 4 ..
उस संहितादि उपनिषद् [अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी उपासना]-के परिज्ञानके कारण जिस यशकी याचना की जाती है वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्यका वाक्य है, क्योंकि अकृतार्थ होनेके कारण शिष्यके लिये ही प्रार्थना करना सम्भव भी है—आचार्यके लिये नहीं, क्योंकि वह कृतार्थ होता है; जो पुरुष कृतार्थ होता है वही आचार्य कहलाता है ।
‘अथ’ अर्थात् पहले कहे हुए अध्ययनरूप विधानके अनन्तर, ‘अतः’—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको सहसा अर्थज्ञान [—को ग्रहण करने]-में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता, इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी संहितोपनिषद् अर्थात् संहितासम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण—आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें व्याख्या करेंगे । [तात्पर्य यह कि वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके ज्ञान बतलावेंगे] ।
वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं? सो बतलाते हैं—‘अधिलोक’—जो दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक कहते हैं । इसी प्रकार अधिज्यौतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषयसम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महावस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती संहिता अर्थात् ‘महासंहिता’ कहकर पुकारते हैं ।
अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच प्रकारकी उपासनाओं)-मेंसे पहले अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है । यहाँ दर्शनक्रम बतलाना इष्ट होनेके कारण ‘अथ’ शब्दकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । पृथिवी पूर्वरूप है । यहाँ पूर्ववर्ण ही पूर्वरूप कहा गया है । इससे यह बतलाया गया है कि संहिता (सन्धि) के प्रथम वर्णमें पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । इसी प्रकार द्युलोक उत्तररूप (अन्तिम वर्ण) है, आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष सन्धि—पूर्व और उत्तररूपका मध्य है अर्थात् इसमें ही पूर्व और उत्तररूप एकत्रित किये जाते हैं । वायु सन्धान है । जिससे सन्धि की जाय उसे सन्धान कहते हैं । इस प्रकार अधिलोक दर्शन कहा गया । इसीके समान ‘अथाधिज्यौतिषम्’ इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये ।
‘इति’ और ‘इमाः’ इन शब्दोंसे पूर्वोक्त दर्शनोंका परामर्श किया जाता है । जो कोई इस प्रकार व्याख्या की हुई इस महासंहिताको जानता अर्थात् उपासना करता है—यहाँ उपासनाका प्रकरण होनेके कारण ‘वेद’ शब्दसे उपासना समझना चाहिये जैसा कि ‘इति प्राचीनयोग्योपास्स्व’ इस आगे (१ । ६ । २ में) कहे जानेवाले वचनसे सिद्ध होता है । शास्त्रानुसार समान प्रत्ययके प्रवाहका नाम ‘उपासना’ है । वह प्रवाह विजातीय प्रत्ययोंसे रहित और शास्त्रोक्त आलम्बनको आश्रय करनेवाला होना चाहिये । लोकमें ‘गुरुकी उपासना करता है’ ‘राजाकी उपासना करता है’ इत्यादि वाक्योंमें ‘उपासना’ शब्दका अर्थ प्रसिद्ध ही है । जो पुरुष गुरु आदिकी निरन्तर परिचर्या करता है वही ‘उपासना करता है’ ऐसा कहा जाता है । वही उस उपासनाका फल भी प्राप्त करता है । अतः इस महासंहिताके सम्बन्धमें भी जो पुरुष इस प्रकार उपासना करता है वह [मन्त्रमें बतलाये हुए] प्रजासे लेकर स्वर्गपर्यन्त समस्त पदार्थोंसे सम्पन्न होता है, अर्थात् प्रजादिरूप फल प्राप्त करता है ॥ १—४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञाननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्नावावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवास्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्यवचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थत्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो नाम भवति ।
अथानन्तरमध्ययनलक्षणविधानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थभाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणेष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः ।
कानि तानीत्याह-अधिलोकं लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् । तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्ममिति । ता एताः पञ्चविषया उपनिषदो लोकादिमहावस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च महत्यश्च ताः संहिताश्च महासंहिता इत्याचक्षते कथयन्ति वेदविदः ।
अथ तासां यथोपन्यस्तानामधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शनक्रमविवक्षार्थोऽथशब्दः सर्वत्र । पृथिवी पूर्वरूपं पूर्वो वर्णः पूर्वरूपम् । संहितायाः पूर्वे वर्णे पृथिवीदृष्टिः कर्तव्येत्युक्तं भवति । तथा द्यौः उत्तररूपमाकाशोऽन्तरिक्षलोकः संधिर्मध्यं पूर्वोत्तररूपयोः संधीयेते अस्मिन्पूर्वोत्तररूपे इति । वायुः संधानम् । संधीयतेऽनेनेति संधानम् । इत्यधिलोकं दर्शनमुक्तम् । अथाधिज्यौतिषमित्यादि समानम् ।
इतीमा इत्युक्ता उपप्रदर्श्यन्ते । यः कश्चिदेवमेता महासंहिता व्याख्याता वेदोपास्ते । वेदेत्युपासनं स्याद्विज्ञानाधिकारात् “इति प्राचीनयोग्योपास्स्व” इति च वचनात् । उपासनं च यथाशास्त्रं तुल्यप्रत्ययसन्ततिरसंकीर्णा चातत्प्रत्ययैः शास्त्रोक्तालम्बनविषया च । प्रसिद्धश्चोपासनशब्दार्थो लोके गुरुमुपास्ते राजानमुपास्त इति । यो हि गुर्वादीन्सन्ततमुपचरति स उपास्त इत्युच्यते । स च फलमाप्नोत्युपासनस्य । अतोऽत्रापि च य एवं वेद संधीयते प्रजादिभिः स्वर्गान्तैः । प्रजादिफलान्याप्नोतीत्यर्थः ॥ १—४ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥
चतुर्थ अनुवाक
श्री और बुद्धि की कामनावालों के लिये जप और होमसम्बन्धी मन्त्र
अब ‘यश्छन्दसाम्’ इत्यादि मन्त्रों से मेधाकामी तथा श्रीकामी पुरुषों के लिये उनकी प्राप्ति के साधन जप और होम बतलाये जाते हैं; क्योंकि “वह इन्द्र मुझे मेधा से प्रसन्न अथवा बलयुक्त करे” तथा “अतः उस श्री को तू मेरे पास ला” इन वाक्यों में [क्रमशः मेधा और श्रीप्राप्ति के लिये की गयी प्रार्थना के] लिङ्ग देखे जाते हैं ।
[ * ]: हे प्राचीनयोग्य शिष्य! इस प्रकार तू उपासना कर ।