वासाग्ँसि मम गावश्च ।
अन्नपाने च सर्वदा ।
ततो मे श्रियमावह ।
लोमशां पशुभिः सह स्वाहा ।
आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ २ ॥
kurvāṇācīramātmanaḥ .
vāsāg̐si mama gāvaśca .
annapāne ca sarvadā .
tato me śriyamāvaha .
lomaśāṃ paśubhiḥ saha svāhā .
āmāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā .
vimāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā .
pramāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā .
damāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā .
śamāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā .. 2 ..
जो [ओंकार] प्रधान होने के कारण छन्द—वेदों में श्रेष्ठ के समान श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण वाणी में व्याप्त होने के कारण विश्वरूप यानी सर्वमय है; जैसा कि “जिस प्रकार शङ्कुओं (पत्तों की नसों) से [सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकार से सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है—ओंकार ही यह सब कुछ है]” इस एक अन्य श्रुति से सिद्ध होता है । इसीलिये ओंकार की श्रेष्ठता है । यहाँ ओंकार ही उपासनीय है, इसलिये ‘ऋषभ’ आदि शब्दों से ओंकार की स्तुति की जानी उचित ही है । छन्द अर्थात् वेदों से—वेद ही अमृत हैं, उस अमृत से जो प्रधानरूप से हुआ है । तात्पर्य यह है कि लोक, देव, वेद और व्याहृतियों से सर्वोत्कृष्ट सार ग्रहण करने की इच्छा से तप करते हुए प्रजापति को ओंकार ही सर्वोत्तम साररूप से भासित हुआ था, क्योंकि नित्य ओंकार की साक्षात् उत्पत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती । वह इस प्रकार का ओंकाररूप इन्द्र—सम्पूर्ण कामनाओं का स्वामी परमेश्वर मुझे मेधा द्वारा प्रसन्न अथवा सबल करे; इस प्रकार यहाँ बुद्धिबल के लिये प्रार्थना की जाती है ।
हे देव! मैं अमृत—अमृतत्व के हेतुभूत ब्रह्मज्ञान का धारण करनेवाला होऊँ, क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञान का ही प्रसङ्ग है । तथा मेरा शरीर विचर्षण—विचक्षण अर्थात् योग्य हो । [मूल में ‘भूयासम्’ (होऊँ) यह उत्तम पुरुष का प्रयोग है इसे] ‘भूयात्’ (हो) इस प्रकार प्रथम पुरुष में परिणत कर लेना चाहिये । मेरी जिह्वा मधुमत्तमा—अतिशय मधुमती अर्थात् अत्यन्त मधुरभाषिणी हो । मैं कानों से भूरि—अधिक मात्रा में श्रवण करूँ अर्थात् बड़ा श्रोता होऊँ । इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि मेरा शरीर और इन्द्रियसंघात आत्मज्ञान के योग्य हो । तथा उसीके लिये ही बुद्धि की याचना की जाती है ।
परमात्मा की उपलब्धि का स्थान होने के कारण तू तलवार के कोश के समान ब्रह्म यानी परमात्मा का कोश है, क्योंकि तू ब्रह्म का प्रतीक है—तुझमें ब्रह्म की उपलब्धि होती है । वही तू मेधा अर्थात् लौकिकी बुद्धि से आच्छादित यानी ढका हुआ है; अर्थात् सामान्यबुद्धि पुरुषों को तेरे तत्त्व का ज्ञान नहीं होता । मेरे श्रुत अर्थात् श्रवणपूर्वक आत्मज्ञानादि विज्ञान की रक्षा कर; अर्थात् उसकी प्राप्ति एवं अविस्मरण आदि कर । ये मन्त्र मेधाकामी पुरुष के जप के लिये हैं ।
अब लक्ष्मीकामी पुरुष को होम के लिये मन्त्र बतलाये जाते हैं—आवहन्ती—लानेवाली; वितन्वाना—विस्तार करनेवाली, क्योंकि ‘तनु’ धातु का अर्थ विस्तार करना ही है; कुर्वाणा—करनेवाली; अचीरम्—अचिर अर्थात् शीघ्र ही; ‘अचीरम्’ में दीर्घ ईकार वैदिक प्रक्रिया के अनुसार है । अथवा चिरं (चिरकाल तक) आत्मनः—मेरे लिये करनेवाली, क्या करनेवाली? सो बतलाते हैं—मेरे वस्त्र, गौ और अन्न-पान इन्हें जो श्री सदा ही करनेवाली है उसे, बुद्धि प्राप्त कराने के अनन्तर तू मेरे पास ला, क्योंकि बुद्धिहीन के लिये तो लक्ष्मी अनर्थ का ही कारण होती है ।
किन विशेषणों से युक्त श्री को लावे? लोमश अर्थात् भेड़-बकरी आदि ऊनवालों के सहित और अन्य पशुओं से युक्त श्री को ला । यहाँ ‘आवह’ क्रिया का अधिकार होने के कारण [उसके कर्ता] ओंकार से ही सम्बन्ध है । स्वाहा—यह स्वाहाकार होमार्थ मन्त्रों का अन्त सूचित करने के लिये है । [‘आ मायन्तु ब्रह्मचारिणः’ इस वाक्य में] ‘आयन्तु माम्’ इस प्रकार ‘आ’ का व्यवधानयुक्त ‘यन्तु’ शब्द से सम्बन्ध है । [इसी प्रकार मेरे प्रति] ब्रह्मचारीलोग निष्कपट हों । वे प्रमा को धारण करें, इन्द्रिय-निग्रह करें, मनोनिग्रह करें इत्यादि ॥ १-२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यश्छन्दसां वेदानामृषभ इवर्षभः ओङ्कारतो बुद्धि- प्राधान्यात् । विश्वरूपः बलं प्रार्थ्यते सर्वरूपः सर्ववाग्व्याप्तेः । “तद्यथा शङ्कुना” (छा० उ० २ । २३ । ३) इत्यादि श्रुत्यन्तरात् । अत एवर्षभत्वमोङ्कारस्य । ओङ्कारो ह्यत्रोपास्य इति ऋषभादिशब्दैः स्तुतिर्न्याय्यैवोङ्कारस्य । छन्दोभ्यो वेदेभ्यो वेदा ह्यमृतं तस्मादमृतादधिसंबभूव । लोकदेववेदव्याहृतिभ्यः सारिष्ठं जिघृक्षोः प्रजापतेस्तपस्यत ओङ्कारः सारिष्ठत्वेन प्रत्यभादित्यर्थः । न हि नित्यस्योङ्कारस्याञ्जसैवोत्पत्तिरेव कल्प्यते । स एवंभूत ओङ्कार इन्द्रः सर्वकामेशः परमेश्वरो मा मां मेधया प्रज्ञया स्पृणोतु प्रीणयतु बलयतु वा । प्रज्ञाबलं हि प्रार्थ्यते ।
अमृतस्य अमृतत्वहेतुभूतस्य ब्रह्मज्ञानस्य तदधिकारात्, हे देव धारणो धारयिता भूयासं भवेयम् । किं च शरीरं मे मम विचर्षणं विचक्षणं योग्यमित्येतत् । भूयादिति प्रथमपुरुषविपरिणामः । जिह्वा मे मधुमत्तमा मधुमत्यतिशयेन मधुरभाषिणीत्यर्थः । कर्णाभ्यां श्रोत्राभ्यां भूरि बहु विश्रवं व्यश्रवं श्रोता भूयासमित्यर्थः । आत्मज्ञानयोग्यः कार्यकारणसंघातोऽस्त्विति वाक्यार्थः । मेधा च तदर्थमेव हि प्रार्थ्यते ।
ब्रह्मणः परमात्मनः कोशोऽसि । असेरिवोपलब्ध्यधिष्ठानत्वात् । त्वं हि ब्रह्मणः प्रतीकं त्वयि ब्रह्मोपलभ्यते । मेधया लौकिकप्रज्ञया पिहित आच्छादितः स त्वं सामान्यप्रज्ञैरविदिततत्त्व इत्यर्थः । श्रुतं श्रवणपूर्वकमात्मज्ञानादिकं मे गोपाय रक्ष । तत्प्राप्त्यविस्मरणादि कुर्वित्यर्थः जपार्था एते मन्त्रा मेधाकामस्य ।
होमार्थास्त्वधुना श्रीकामस्य ओङ्कारतः मन्त्रा उच्यन्ते । श्रियः प्रार्थना आवहन्त्यानयन्ती । वितन्वाना विस्तारयन्ती । तनोतेस्तत्कर्मत्वात् । कुर्वाणा निर्वर्तयन्ती, अचीरमचिरं क्षिप्रमेव, छान्दसो दीर्घः; चिरं वा कुर्वाणा आत्मनो मम, किमित्याह—वासांसि वस्त्राणि मम गावश्च गाश्चेति यावत्, अन्नपाने च सर्वदैवमादीनि कुर्वाणा श्रीर्या तां ततो मेधानिर्वर्तनात्परमावहानय । अमेधसो हि श्रीरनर्थायैवेति ।
किंविशिष्टाम् । लोमशामजाव्यादियुक्तामन्यैश्च पशुभिः संयुक्तामावहेत्यधिकारादोङ्कार एवाभिसंबध्यते । स्वाहा स्वाहाकारो होमार्थमन्त्रान्तज्ञापनार्थः । आयन्तु मामिति व्यवहितेन संबन्धः । ब्रह्मचारिणो विमायन्तु प्रमायन्तु दमायन्तु शमायन्त्वित्यादि ॥ १-२ ॥